नीवारपाकादि कडंगरीयै-
रामृश्यते जानपदैर्न कञ्चित् ।
कालोपपन्नातिथिकल्प्यभागं
वन्यं शरीरस्थितिसाधनं वः ॥
नीवारपाकादि कडंगरीयै-
रामृश्यते जानपदैर्न कञ्चित् ।
कालोपपन्नातिथिकल्प्यभागं
वन्यं शरीरस्थितिसाधनं वः ॥
रामृश्यते जानपदैर्न कञ्चित् ।
कालोपपन्नातिथिकल्प्यभागं
वन्यं शरीरस्थितिसाधनं वः ॥
अन्वयः
AI
वः काल-उपपन्न-अतिथि-कल्प्य-भागम् वन्यम् शरीर-स्थिति-साधनम् नीवार-पाक-आदि कडंगरीयैः जानपदैः कञ्चित् न आमृश्यते?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
नीवारेति॥ कालेषु योग्यकालेषूपपन्नानामगतानामतिथीनां कल्प्याभागा यस्य तत्तथोक्तम्। वने भवं वन्यम्। शरीरस्थिते र्जीवनस्य साधनं वो युष्माकम्। पच्यत इति पाकः फलम्। धान्यमिति यावत्। नीवारपाकादि।
आदिशब्दाञ्छ्यामाकादिधान्यसंग्रहः। जनपदेभ्य आगतैर्जानपदैः। तत आगतः (अष्टाध्यायी ४.३.७४ ) इत्यण्। कडंगरीयैः। कडंगरं बुसमर्हन्तीति कडंगरीयाः। कडंगरो बुसंक्लीबे धान्यत्वचि तुषः पुमान् इत्यमरः। कडंगरदक्षिणाच्छ च (अष्टाध्यायी ५.१.६९ ) इति छप्रत्ययः। तैर्गोमहिषादिभिर्नामृश्यते कञ्चित् ? न भक्ष्यते किमित्यर्थः॥
Summary
AI
"I hope that your means of subsistence, the wild produce like ripening wild rice—from which a portion is always set aside for guests who may arrive—is not being interfered with by villagers who gather fodder?"
सारांश
AI
क्या आपके शरीर निर्वाह का साधन और अतिथियों के लिए रक्षित वह वन्य अन्न ग्रामीणों के पशुओं द्वारा नष्ट तो नहीं किया जाता?
पदच्छेदः
AI
| नीवारपाकादि | नीवार–पाक–आदि (१.१) | wild rice and other produce |
| कडंगरीयैः | कडंगरीय (३.३) | by those who gather straw |
| आमृश्यते | आमृश्यते (आ√मृश् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is interfered with |
| जानपदैः | जानपद (३.३) | by villagers |
| न | न | not |
| कञ्चित् | कञ्चित् | I hope |
| कालोपपन्नातिथिकल्प्यभागं | काल–उपपन्न–अतिथि–कल्प्य–भाग (१.१) | in which a portion is set aside for a timely guest |
| वन्यं | वन्य (१.१) | wild-growing |
| शरीरस्थितिसाधनं | शरीर–स्थिति–साधन (१.१) | the means of subsistence |
| वः | युष्मद् (६.३) | your |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नी | वा | र | पा | का | दि | क | डं | ग | री | यै |
| रा | मृ | श्य | ते | जा | न | प | दै | र्न | क | ञ्चित् |
| का | लो | प | प | न्ना | ति | थि | क | ल्प्य | भा | गं |
| व | न्यं | श | री | र | स्थि | ति | सा | ध | नं | वः |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.