तां प्रत्यभिव्यक्तमनोरथानां
महीपतीनां प्रणयाग्रदूत्यः ।
प्रवालशोभा इव पादपानां
श्रृङ्गारचेष्टा विविधा बभूवुः ॥
तां प्रत्यभिव्यक्तमनोरथानां
महीपतीनां प्रणयाग्रदूत्यः ।
प्रवालशोभा इव पादपानां
श्रृङ्गारचेष्टा विविधा बभूवुः ॥
महीपतीनां प्रणयाग्रदूत्यः ।
प्रवालशोभा इव पादपानां
श्रृङ्गारचेष्टा विविधा बभूवुः ॥
अन्वयः
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ताम् प्रति अभिव्यक्त-मनोरथानाम् महीपतीनाम् विविधाः शृङ्गार-चेष्टाः, पादपानाम् प्रवाल-शोभाः इव, प्रणय-अग्र-दूत्यः बभूवुः।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तामिति॥ तामिन्दुमतीं प्रति। अभिव्यक्तमनोरथानां प्ररूढाभिलाषाणां महीपतीनां राज्ञां प्रणयाग्रदूत्यः। प्रणयः प्रार्थना प्रेम वा।
प्रणयास्त्वमी। विस्रम्भयाच्ञाप्रेमाणः इत्यमरः। प्रणयेष्वग्रदूत्यः प्रथमदूतिकाः। प्रणयप्रकाशकत्वसाम्याद्दूतीत्वव्यपदेशः। विविधाः श्रृङ्गारचेष्टाः शृङ्गारविकारः पादपानां प्रवालशोभाः पल्लवसंपद इव बभूवुरुत्पन्नाः। अत्र शृङ्गारलक्षणं रससुधाकरे-विभावैरनुभावैश्च स्वोचितैर्व्यभिचारिभिः। नीता सदस्यरस्यत्वं रतिः शृङ्गार उच्यते ॥रतिरिच्छाविशेषः। तञ्चोक्तं तत्रैव-यूनोरन्योन्यविषयस्थायिनीच्छा रतिः स्मृता इति॥ चेष्टाशब्देन तदनुभावविशेषा उच्यन्ते। तेऽपि तत्रैवोक्ताः-भावं मनोगतं साक्षात्स्वहेतुं व्यञ्जयन्ति ये। तेऽनुभावा इति ख्याता भ्रूविक्षेपस्मितादयः। ते चतुर्धा चित्तगात्रवाग्बुद्ध्यारम्भसंभवाः॥ इति। तत्र गात्रारम्भसंभवांश्चेष्टाशब्दोक्ताननुभावान् कश्चित्(६।१३) इत्यादिभिः श्लोकैर्वक्ष्यति। शृङ्गाराभासश्चायम्; एकत्रैव प्रतिपादनात्। तदुक्तम्-एकत्रैवानुरागश्चेत्तिर्यक्शब्दगतोऽपि वा। योषितां बहुसक्तिश्चेद्रसाभासस्त्रिधा मतः॥ इति ॥
Summary
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For the kings whose desires towards her were now manifest, their various amorous gestures became the primary messengers of their love. These gestures were like the beauty of fresh sprouts on trees, which announce the arrival of spring.
सारांश
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इन्दुमती को देखकर अपनी इच्छा प्रकट करने के लिए राजाओं ने विभिन्न श्रृंगारिक चेष्टाएं कीं, जो वृक्षों पर निकलने वाले नए कोपलों के समान सुंदर थीं।
पदच्छेदः
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| ताम् | तद् (२.१) | towards her |
| प्रति | प्रति | towards |
| अभिव्यक्तमनोरथानाम् | अभिव्यक्त–मनोरथ (६.३) | of those whose desires were manifest |
| महीपतीनाम् | महीपति (६.३) | of the kings |
| प्रणयाग्रदूत्यः | प्रणय–अग्र–दूती (१.३) | the primary messengers of love |
| प्रवालशोभाः | प्रवाल–शोभा (१.३) | the beauty of fresh sprouts |
| इव | इव | like |
| पादपानाम् | पादप (६.३) | of the trees |
| शृङ्गारचेष्टाः | शृङ्गार–चेष्टा (१.३) | amorous gestures |
| विविधाः | विविध (१.३) | various |
| बभूवुः | बभूवुः (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | became |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तां | प्र | त्य | भि | व्य | क्त | म | नो | र | था | नां |
| म | ही | प | ती | नां | प्र | ण | या | ग्र | दू | त्यः |
| प्र | वा | ल | शो | भा | इ | व | पा | द | पा | नां |
| श्रृ | ङ्गा | र | चे | ष्टा | वि | वि | धा | ब | भू | वुः |
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