विस्रस्तमंसादपरो विलासी
रत्नानुविद्धाङ्गदकोटिलग्नम् ।
प्रालम्बमुत्कृष्य यथावकाशं
निनाय साचीकृतचारुवक्त्रः ॥
विस्रस्तमंसादपरो विलासी
रत्नानुविद्धाङ्गदकोटिलग्नम् ।
प्रालम्बमुत्कृष्य यथावकाशं
निनाय साचीकृतचारुवक्त्रः ॥
रत्नानुविद्धाङ्गदकोटिलग्नम् ।
प्रालम्बमुत्कृष्य यथावकाशं
निनाय साचीकृतचारुवक्त्रः ॥
अन्वयः
AI
अपरः विलासी साची-कृत-चारु-वक्त्रः (सन्) अंसात् विस्रस्तम्, रत्न-अनुविद्ध-अङ्गद-कोटि-लग्नम् प्रालम्बम् उत्कृष्य यथा-अवकाशम् निनाय।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
विस्रस्तमिति॥ विलसनशीलो विलासी।
वौ कषलसकत्थस्रम्भः (अष्टाध्यायी ३.२.१४३ ) इति घिनुण्प्रत्ययः। अपरो राजा । अंसाद्विस्रस्तं रत्नानुविद्धं रत्नखचितं यदङ्गदं केयूरं तस्य कोटिलग्नं प्रालम्ब मृजुलम्बिनीं स्रजम्। प्रालम्बमृजुलम्बि स्यात्कण्ठात् इत्यमरः (अमरकोशः २.६.१३७ ) । प्रावारम् इति पाठे तूत्तरीयं वस्त्रम्। उत्कृष्योद्धृत्य साचीकृतं तिर्यक्कृतं चारु वक्त्रं यस्य स तथोक्तः सन्, यथावकाशं स्वस्थानं निनाय। प्रावारोत्क्षेपणच्छलेनाहं त्वामेवं परिरप्स्ये- इति नृपाभिप्रायः। गोपनीयं किंचिदङ्गेऽस्ति ततोऽयं प्रावृणुते-इतीन्दुमत्यभिप्रायः ॥
Summary
AI
Another amorous king, turning his handsome face sideways, pulled up his pearl necklace. It had slipped from his shoulder and caught on the edge of his jewel-studded armlet, and he adjusted it back to its proper place.
सारांश
AI
एक विलासी राजा ने गर्दन टेढ़ी कर, बाजूबंद में फँसे हुए अपने मोतियों के हार को खींचकर यथास्थान ठीक किया।
पदच्छेदः
AI
| विस्रस्तम् | विस्रस्त (वि√स्रंस्+क्त, २.१) | slipped |
| अंसात् | अंस (५.१) | from the shoulder |
| अपरः | अपर (१.१) | another |
| विलासी | विलासिन् (१.१) | amorous king |
| रत्नानुविद्धाङ्गदकोटिलग्नम् | रत्न–अनुविद्ध–अङ्गद–कोटि–लग्न (२.१) | caught on the edge of the jewel-studded armlet |
| प्रालम्बम् | प्रालम्ब (२.१) | the necklace |
| उत्कृष्य | उत्कृष्य (उत्√कृष्+ल्यप्) | having pulled up |
| यथावकाशम् | यथावकाशम् | to its proper place |
| निनाय | निनाय (√नी कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he adjusted |
| साचीकृतचारुवक्त्रः | साची–कृत–चारु–वक्त्र (१.१) | he whose handsome face was turned sideways |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | स्र | स्त | मं | सा | द | प | रो | वि | ला | सी |
| र | त्ना | नु | वि | द्धा | ङ्ग | द | को | टि | ल | ग्नम् |
| प्रा | ल | म्ब | मु | त्कृ | ष्य | य | था | व | का | शं |
| नि | ना | य | सा | ची | कृ | त | चा | रु | व | क्त्रः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.