तस्मिन्नभिद्योतितबन्धुपद्मे
प्रतापसंशोषितशत्रुपङ्के ।
बबन्ध सा नोत्तमसौकुमार्या
कुमुद्वती भानुमतीव भावम् ॥
तस्मिन्नभिद्योतितबन्धुपद्मे
प्रतापसंशोषितशत्रुपङ्के ।
बबन्ध सा नोत्तमसौकुमार्या
कुमुद्वती भानुमतीव भावम् ॥
प्रतापसंशोषितशत्रुपङ्के ।
बबन्ध सा नोत्तमसौकुमार्या
कुमुद्वती भानुमतीव भावम् ॥
अन्वयः
AI
उत्तमसौकुमार्या सा तस्मिन् अभिद्योतितबन्धुपद्मे प्रतापसंशोषितशत्रुपङ्के राजहंसे भावं न बबन्ध, कुमुद्वती भानुमति इव ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तस्मिन्निति॥ उत्तमसौकुमार्योत्कृष्टाङ्गमार्दवा सेन्दुमती। अभिद्योतितान्युल्लसितानि बन्धव एव पद्मानि येन तस्मिन्। प्रतापेन तेजसा संशोषिताः शत्रव एव पङ्काः कर्दमा येन तस्मिन्। तस्मिन्नवन्तिनाथे कुमुद्वती।
कुमुदनडवेतसेभ्यो डतुपु (अष्टाध्यायी ४.२.८७ ) इति ङ्मतुप्प्रत्ययः। भानुमत्यंशुमतीव। भावं चित्तं न बबन्ध। न तत्रानुरागमकरोदित्यर्थः। बन्धूनां पद्मत्वेन शत्रूणां पङ्कत्वेन च निरूपणं राज्ञः सूर्यसाम्यार्थम् ॥
Summary
AI
She, of utmost delicacy, did not fix her affection on him—who made his kinsmen bloom like lotuses and dried up his enemies like mud with his valor—just as a night-lotus does not open its heart to the sun.
सारांश
AI
यद्यपि वे राजा अपने बंधुओं को आनंद देने वाले और शत्रुओं का नाश करने वाले थे, फिर भी सुकुमारी इंदुमती का मन उनमें नहीं लगा, जैसे सूर्य को देखकर कुमुदिनी नहीं खिलती।
पदच्छेदः
AI
| तस्मिन् | तद् (७.१) | in him |
| अभिद्योतितबन्धुपद्मे | अभिद्योतित–बन्धु–पद्म (७.१) | in him who made the lotuses of his kinsmen bloom |
| प्रतापसंशोषितशत्रुपङ्के | प्रताप–संशोषित–शत्रु–पङ्क (७.१) | in him who dried up the mud of his enemies by his valor |
| बबन्ध | बबन्ध (√बन्ध् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | fixed |
| सा | तद् (१.१) | she |
| न | न | not |
| उत्तमसौकुमार्या | उत्तम–सौकुमार्य (१.१) | of extreme delicacy |
| कुमुद्वती | कुमुद्वती (१.१) | a night-lotus |
| भानुमति | भानुमत् (७.१) | in the sun |
| इव | इव | like |
| भावम् | भाव (२.१) | affection |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | स्मि | न्न | भि | द्यो | ति | त | ब | न्धु | प | द्मे |
| प्र | ता | प | सं | शो | षि | त | श | त्रु | प | ङ्के |
| ब | ब | न्ध | सा | नो | त्त | म | सौ | कु | मा | र्या |
| कु | मु | द्व | ती | भा | नु | म | ती | व | भा | वम् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.