अनेन सार्धं विहराम्बुराशेस्तीरेषु तालीवनमर्मरेषु ।
द्वीपान्तरानीतलवङ्गपुष्पैरपाकृतस्वेदलवा मरुद्भिः ॥
अनेन सार्धं विहराम्बुराशेस्तीरेषु तालीवनमर्मरेषु ।
द्वीपान्तरानीतलवङ्गपुष्पैरपाकृतस्वेदलवा मरुद्भिः ॥
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अनेनेति॥ अनेन राज्ञा सार्धं तालीवनैर्मर्मरेषु मर्मरेति ध्वनत्सु।अथ मर्मरः। स्वनिते वस्त्रपर्णानाम्इत्यमरवचनाद्गुणपरस्यापि मर्मर शब्दस्य गुणिपरत्वं प्रयोगादवसेयम्। अम्बुराशेः समुद्रस्य तीरेषु द्वीपान्तरेभ्य आनीतानि लवङ्गपुष्पाणि देवकुसुमानि यैस्तैः। लवङ्गं देवकुसुमम् इत्यमरः (अमरकोशः २.६.१२६ ) । मरुद्भिर्वातैरपाकृताः प्रशमिताः स्वेदस्य लवा बिन्दवो यस्याः सा तथाभूता सती त्वं विहर क्रीड ॥
पदच्छेदः
| अनेन | अदस् (३.१) | with this |
| सार्धम् | सार्धम् | with |
| विहर | विहर (वि√हृ कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | sport |
| अम्बुराशेः | अम्बुराशि (६.१) | of the ocean |
| तीरेषु | तीर (७.३) | on the shores |
| तालीवनमर्मरेषु | ताली–वन–मर्मर (७.३) | which rustle with palm groves |
| द्वीपान्तरानीतलवङ्गपुष्पैः | द्वीपान्तर–आनीत–लवङ्ग–पुष्प (३.३) | by (breezes) with clove flowers brought from other islands |
| अपाकृतस्वेदलवा | अपाकृत–स्वेद–लव (१.१) | you whose drops of perspiration are removed |
| मरुद्भिः | मरुत् (३.३) | by the breezes |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ने | न | सा | र्धं | वि | ह | रा | म्बु | रा | शे |
| स्ती | रे | षु | ता | ली | व | न | म | र्म | रे | षु |
| द्वी | पा | न्त | रा | नी | त | ल | व | ङ्ग | पु | ष्पै |
| र | पा | कृ | त | स्वे | द | ल | वा | म | रु | द्भिः |