अन्वयः
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विदर्भ-अधिपतेः स्वसुः चेतसि तदीयः उपदेशः, दिवाकर-अदर्शन-बद्ध-कोशे अरविन्दे नक्षत्र-नाथ-अंशुः इव, अन्तरम् न लेभे ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
स्वसुरिति॥ विदर्भाधिपतेर्भोजस्य स्वसुरिन्दुमत्याश्चेतसि तदीयः सुनन्दासंबन्ध्युपदेशो वाक्यम्। दिवाकरस्यादर्शनेन बद्धकोशे मुकुलितेऽरविन्दे नक्षत्रनाथांशुश्चन्द्रकिरण इव। अन्तरमवकाशं न लेभे ॥
Summary
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That advice (from Sunanda) did not find a place in the heart of the sister of the Vidarbha king (Indumati), just as a moonbeam fails to enter a lotus that has closed its petals due to the absence of the sun.
सारांश
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विदर्भराज की बहन इंदुमती पर इस उपदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जैसे रात में चंद्रमा की किरणों को देखकर भी बंद पंखुड़ियों वाला कमल नहीं खिलता, वैसे ही उनका मन विचलित नहीं हुआ।
पदच्छेदः
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| स्वसुः | स्वसृ (६.१) | of the sister |
| विदर्भाधिपतेः | विदर्भ–अधिपति (६.१) | of the lord of Vidarbha |
| तदीयः | तदीय (१.१) | that |
| लेभे | लेभे (√लभ् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | obtained |
| अन्तरम् | अन्तर (२.१) | a place |
| चेतसि | चेतस् (७.१) | in the heart |
| न | न | not |
| उपदेशः | उपदेश (१.१) | advice |
| दिवाकरादर्शनबद्धकोशे | दिवाकर–अदर्शन–बद्ध–कोश (७.१) | in the one whose bud is closed due to the absence of the sun |
| नक्षत्रनाथांशुः | नक्षत्र–नाथ–अंशु (१.१) | a moonbeam |
| इव | इव | like |
| अरविन्दे | अरविन्द (७.१) | in a lotus |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्व | सु | र्वि | द | र्भा | धि | प | ते | स्त | दी | यो |
| ले | भे | ऽन्त | रं | चे | त | सि | नो | प | दे | शः |
| दि | वा | क | रा | द | र्श | न | ब | द्ध | को | शे |
| न | क्ष | त्र | ना | थां | शु | रि | वा | र | वि | न्दे |
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