जातः कुले तस्य किलोरुकीर्तिः
कुलप्रदीपो नृपतिर्दिलीपः ।
अतिष्ठदेकोनशतक्रतुत्वे
शक्राभ्यसूयाविनिवृत्तये यः ॥
जातः कुले तस्य किलोरुकीर्तिः
कुलप्रदीपो नृपतिर्दिलीपः ।
अतिष्ठदेकोनशतक्रतुत्वे
शक्राभ्यसूयाविनिवृत्तये यः ॥
कुलप्रदीपो नृपतिर्दिलीपः ।
अतिष्ठदेकोनशतक्रतुत्वे
शक्राभ्यसूयाविनिवृत्तये यः ॥
अन्वयः
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तस्य कुले किल उरु-कीर्तिः कुल-प्रदीपः दिलीपः नृपतिः जातः, यः शक्र-अभ्यसूया-विनिवृत्तये एक-ऊन-शत-क्रतुत्वे अतिष्ठत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
जात इति॥ उरुकीर्तिर्महायशाः कुलप्रदीपो वंशप्रदीपको दिलीपो नृपतिस्तस्य ककुत्स्थस्य कुले जातः किल। यो दिलीपः शक्राभ्यसूयाविनिवृत्तये। न त्वशक्त्येति भावः। एकेनोनाः शतं क्रतवो यस्य स एकोनशतक्रतुस्तस्य भावे तत्त्वेऽतिष्ठत्। इन्द्रप्रीतये शततमं क्रतुमवशेषितवानित्यर्थः॥
Summary
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"In his (Kakutstha's) lineage was born the renowned king Dilipa, a lamp to his dynasty, who, to avoid Indra's jealousy, stopped at the completion of ninety-nine sacrifices (one short of Indra's hundred)."
सारांश
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उसी वंश में अत्यंत कीर्तिवान राजा दिलीप हुए, जिन्होंने इंद्र की ईर्ष्या से बचने के लिए जानबूझकर सौ यज्ञ पूरे नहीं किए और निन्यानवे पर ही रुक गए।
पदच्छेदः
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| जातः | जात (√जन्+क्त, १.१) | was born |
| कुले | कुल (७.१) | in the lineage |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| किल | किल | indeed |
| उरुकीर्तिः | उरु–कीर्ति (१.१) | the renowned |
| कुलप्रदीपः | कुल–प्रदीप (१.१) | a lamp to his dynasty |
| नृपतिः | नृपति (१.१) | king |
| दिलीपः | दिलीप (१.१) | Dilipa |
| अतिष्ठत् | अतिष्ठत् (√स्था कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | stopped |
| एकोनशतक्रतुत्वे | एक-ऊन–शत–क्रतुत्व (७.१) | at the state of ninety-nine sacrifices |
| शक्राभ्यसूयाविनिवृत्तये | शक्र–अभ्यसूया–विनिवृत्ति (४.१) | to avoid Indra's jealousy |
| यः | यद् (१.१) | who |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| जा | तः | कु | ले | त | स्य | कि | लो | रु | की | र्तिः |
| कु | ल | प्र | दी | पो | नृ | प | ति | र्दि | ली | पः |
| अ | ति | ष्ठ | दे | को | न | श | त | क्र | तु | त्वे |
| श | क्रा | भ्य | सू | या | वि | नि | वृ | त्त | ये | यः |
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