आरूढमद्रीनुदधीन्वितीर्णं
भुजंगमानां वसतिं प्रविष्टम् ।
ऊर्ध्वं गतं यस्य न चानुबन्धि
यशः परिच्छेत्तुमियत्तयालम् ॥
आरूढमद्रीनुदधीन्वितीर्णं
भुजंगमानां वसतिं प्रविष्टम् ।
ऊर्ध्वं गतं यस्य न चानुबन्धि
यशः परिच्छेत्तुमियत्तयालम् ॥
भुजंगमानां वसतिं प्रविष्टम् ।
ऊर्ध्वं गतं यस्य न चानुबन्धि
यशः परिच्छेत्तुमियत्तयालम् ॥
अन्वयः
AI
यस्य अद्रीन् आरूढम्, उदधीन् वितीर्णम्, भुजंगमानाम् वसतिम् प्रविष्टम्, ऊर्ध्वम् गतम्, अनुबन्धि च यशः इयत्तया परिच्छेत्तुम् अलम् न (अस्ति) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
आरूढमिति॥ किंच, अद्रीनारूढम्। उदधीन्वितीर्णमवगाढम्। सकलभूगोलव्यापकमित्यर्थः। भुजंगमानां वसतिं पातालं प्रविष्टम्। ऊर्ध्वं स्वर्गादिकं गतं व्याप्तम्। इत्थं सर्वदिग्व्यापीत्यर्थः। अनुबध्नातीत्यनुबन्धि चाविच्छेदि। कालत्रयव्यापकं चेत्यर्थः। अत एवैवंभूतं यस्य यश इयत्तया देशतः कालतो वा केनचिन्मानेन परिच्छेत्तुं परिमातुं नालं न शक्यम् ॥
Summary
AI
Sunanda describes Aja's fame, which has climbed mountains, crossed oceans, entered the netherworld (abode of serpents), and ascended to the heavens. This ever-present and far-reaching fame is impossible to measure or limit by any means.
सारांश
AI
महाराज रघु का यश पर्वतों, समुद्रों, पाताल और स्वर्ग तक फैला हुआ है। उनके निरंतर बढ़ते हुए यश की कोई सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती।
पदच्छेदः
AI
| आरूढम् | आरूढ (आ√रुह्+क्त, २.१) | climbed |
| अद्रीन् | अद्रि (२.२) | mountains |
| उदधीन् | उदधि (२.२) | oceans |
| वितीर्णम् | वितीर्ण (वि√तृ+क्त, २.१) | crossed |
| भुजंगमानाम् | भुजंगम (६.३) | of the serpents |
| वसतिम् | वसति (२.१) | the abode |
| प्रविष्टम् | प्रविष्ट (प्र√विश्+क्त, २.१) | entered |
| ऊर्ध्वम् | ऊर्ध्व | upwards |
| गतम् | गत (√गम्+क्त, २.१) | gone |
| यस्य | यद् (६.१) | whose |
| न | न | not |
| च | च | and |
| अनुबन्धि | अनुबन्धिन् (२.१) | ever-following |
| यशः | यशस् (२.१) | fame |
| परिच्छेत्तुम् | परिच्छेत्तुम् (परि√छिद्+तुमुन्) | to measure |
| इयत्तया | इयत्ता (३.१) | by any measure |
| अलम् | अलम् | able |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | रू | ढ | म | द्री | नु | द | धी | न्वि | ती | र्णं |
| भु | जं | ग | मा | नां | व | स | तिं | प्र | वि | ष्टम् |
| ऊ | र्ध्वं | ग | तं | य | स्य | न | चा | नु | ब | न्धि |
| य | शः | प | रि | च्छे | त्तु | मि | य | त्त | या | लम् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.