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प्रमुदितवरपक्षमेकतस्त-
त्क्षितिपतिमण्डलमन्यतो वितानम् ।
उषसि सर इव प्रफुल्लपद्मं
कुमुदवनप्रतिपन्ननिद्रमासीत् ॥

अन्वयः AI एकतः प्रमुदित-वर-पक्षम्, अन्यतः वितानम् तत् क्षितिपति-मण्डलम्, उषसि प्रफुल्ल-पद्मम् कुमुद-वन-प्रतिपन्न-निद्रम् सरः इव आसीत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) प्रमुदितेति॥ एकत एकत्र प्रमुदितो हृष्टो वरस्य जामातुः पक्षो वर्गो यस्य तत्तथोक्तम्। अन्यतोऽन्यत्र वितानं शून्यम्। भग्नाशत्वादप्रहृष्टमित्यर्थः। तत्क्षितिपतिमण्डलम्। उषसि प्रफुल्लपद्मं कुमुदवनेन प्रतिपन्ननिर्द्रप्राप्तनिमीलनं सर इव सरस्तुल्यम्। आसीत्। पुष्पिताप्रावृत्तमेतत् ॥
Summary AI That assembly of kings became like a lake at dawn: on one side, the groom's party was joyous, like blooming lotuses; on the other side, the rejected suitors were dejected and pale, like a forest of night-lilies that have closed up and gone to sleep.
सारांश AI उस समय एक ओर प्रसन्न राजकुमार पक्ष और दूसरी ओर उदास अन्य राजाओं का समूह प्रातःकाल के उस सरोवर के समान प्रतीत हो रहा था, जिसमें कमल तो खिल रहे हों परंतु कुमुद संकुचित होकर निद्रावस्था में हों।
पदच्छेदः AI
प्रमुदितवरपक्षम्प्रमुदितवरपक्ष (१.१) with the groom's party delighted
एकतःएकतः on one side
तत्तद् (१.१) that
क्षितिपतिमण्डलम्क्षितिपतिमण्डल (१.१) assembly of kings
अन्यतःअन्यतः on the other side
वितानम्वितान (१.१) pale/dejected
उषसिउषस् (७.१) at dawn
सरःसरस् (१.१) a lake
इवइव like
प्रफुल्लपद्मम्प्रफुल्लपद्म (१.१) with lotuses in full bloom
कुमुदवनप्रतिपन्ननिद्रम्कुमुदवनप्रतिपन्न–निद्र (१.१) with the forest of night-lilies having gone to sleep
आसीत्आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) was
छन्दः पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३
प्र मु दि क्ष मे स्त
त्क्षि ति ति ण्ड न्य तो वि ता नम्
सि प्र फु ल्ल द्मं
कु मु प्र ति न्न नि द्र मा सीत्
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