हविःशमीपल्लवलाजगन्धी
पुण्यः कृशानोरुदियाय धूमः ।
कपोलसंसर्पिशिखः स तस्या
मुहूर्तकर्णोत्पलतां प्रपेदे ॥

अन्वयः AI हविः-शमी-पल्लव-लाज-गन्धी पुण्यः धूमः कृशानोः उदियाय । सः कपोल-संसर्पि-शिखः (सन्) तस्याः मुहूर्त-कर्ण-उत्पलताम् प्रपेदे ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) हविरिति॥ हविष आज्यादेः शमीपल्लवानां लाजानां च गन्धोऽस्यास्तीति हविः-शमीपल्लवलाजगन्धी। शमीपल्लवमिश्राँल्लाजानञ्जलिना वपति इति कात्यायनः। पुण्यो धूमः कृशानोः पावकादुदियायोद्धूतः। कपोलयोः संसर्पिणी प्रसहरणशीला शिखा यस्य स तथोक्तः स धूमस्तस्या वध्वा मुहूर्तं कर्णोत्पलतां कर्णाभरणतां प्रपेदे ॥
Summary AI Holy smoke, fragrant with oblations, Shami leaves, and parched grain, arose from the fire. Its wisp, creeping over her cheek, served for a moment as her ear-ornament, like a blue lotus.
सारांश AI हविष्य और शमी के पत्तों की सुगंध वाला पवित्र धुआं ऊपर उठा और वधू के कपोलों को स्पर्श करता हुआ क्षण भर के लिए उसके कान के नीले कमल के आभूषण जैसा बन गया।
पदच्छेदः AI
हविःशमीपल्लवलाजगन्धीहविस्–शमी-पल्लवलाजगन्धिन् (१.१) fragrant with oblations, Shami leaves, and parched grain
पुण्यःपुण्य (१.१) holy
कृशानोःकृशानु (५.१) from the fire
उदियायउदियाय (उद्√इ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) arose
धूमःधूम (१.१) smoke
कपोलसंसर्पिशिखःकपोलसंसर्पिन्शिखा (१.१) whose wisp crept over her cheek
सःतद् (१.१) it (the smoke)
तस्याःतद् (६.१) of her
मुहूर्तकर्णोत्पलताम्मुहूर्त–कर्ण-उत्पलता (२.१) the state of being a momentary ear-lotus
प्रपेदेप्रपेदे (प्र√पद् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) attained
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
विः मी ल्ल ला न्धी
पु ण्यः कृ शा नो रु दि या धू मः
पो सं र्पि शि खः स्या
मु हू र्त र्णो त्प तां प्र पे दे
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