अन्वयः
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आचार-धूम-ग्रहणात् तत् वधू-मुखम् अञ्जन-क्लेद-समाकुल-अक्षम्, प्रम्लान-बीज-अङ्कुर-कर्णपूरम्, पाटल-गण्ड-लेखम् बभूव ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तदिति॥ तद्वधूमुखमाचारेण प्राप्ताद्धूमग्रहणात्। अञ्जनस्य क्लेदोऽञ्जनक्लेदः। अञ्जनभिश्रबाष्पोदकमित्यर्थः। तेन समाकुलाक्षम्। प्रम्लानो बीजाङ्कुरो यवाङ्कुर एव कर्णपूरोऽवतंसो यस्य तत् पाटलगण्डलेखमरुणगण्डस्थलं च बभूव ॥
Summary
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From inhaling the ritual smoke, the bride's face became one whose eyes were troubled by the melting collyrium, whose ear-ornaments of tender sprouts were faded, and whose cheeks had turned a pale red.
सारांश
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धुएं के स्पर्श से वधू की आंखों का काजल बह गया, कान पर सजे बीजांकुर कुम्हला गए और उसके सुंदर कपोलों का रंग हल्का लाल और पीला पड़ गया।
पदच्छेदः
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| तत् | तद् (१.१) | that |
| अञ्जनक्लेदसमाकुलाक्षम् | अञ्जन–क्लेद–समाकुल–अक्ष (१.१) | whose eyes were troubled by the moisture of the collyrium |
| प्रम्लानबीजाङ्कुरकर्णपूरम् | प्रम्लान–बीज-अङ्कुर–कर्णपूर (१.१) | whose ear-ornament of seed-sprouts was faded |
| वधूमुखम् | वधू–मुख (१.१) | the bride's face |
| पाटलगण्डलेखम् | पाटल–गण्ड-लेखा (१.१) | the line of whose cheeks was pale red |
| आचारधूमग्रहणात् | आचार–धूम–ग्रहण (५.१) | from inhaling the ritual smoke |
| बभूव | बभूव (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | द | ञ्ज | न | क्ले | द | स | मा | कु | ला | क्षं |
| प्र | म्ला | न | बी | जा | ङ्कु | र | क | र्ण | पू | रम् |
| व | धू | मु | खं | पा | ट | ल | ग | न्ड | ले | ख |
| मा | चा | र | धू | म | ग्र | ह | णा | द्ब | भू | व |
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