मत्स्यध्वजा वायुवशाद्विदीर्णै-
र्मुखैः प्रवृद्धध्वजिनीरजांसि ।
बभुः पिबन्तः परमार्थमत्स्याः
पर्याविलानीव नवोदकानि ॥
मत्स्यध्वजा वायुवशाद्विदीर्णै-
र्मुखैः प्रवृद्धध्वजिनीरजांसि ।
बभुः पिबन्तः परमार्थमत्स्याः
पर्याविलानीव नवोदकानि ॥
र्मुखैः प्रवृद्धध्वजिनीरजांसि ।
बभुः पिबन्तः परमार्थमत्स्याः
पर्याविलानीव नवोदकानि ॥
अन्वयः
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वायु-वशात् विदीर्णैः मुखैः प्रवृद्ध-ध्वजिनी-रजांसि पिबन्तः मत्स्य-ध्वजाः, पर्याविलानि नव-उदकानि पिबन्तः परमार्थ-मत्स्याः इव, बभुः।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
मत्स्येति॥ वायुवशाद्विदीर्णैर्विवृतैर्मुखैः प्रवृद्धानि ध्वजिनीरजांसि सैन्यरेणून् पिबन्तो गृह्णन्तो मत्स्यध्वजा मत्स्याकारा ध्वजाः पर्याविलानि परितः कलुषाणि नवोदकानि पिबन्तः परमार्थमत्स्याः सत्यमत्स्या इव। बभुर्भान्ति स्म ॥
Summary
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The fish-banners, with their mouths torn open by the force of the wind, appeared to be drinking the thick dust of the army, just like real fish drinking turbid new waters.
सारांश
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हवा से खुले हुए मुख वाले मछली-चिह्नित ध्वज, सेना की उड़ती धूल को ऐसे निगलते हुए लग रहे थे मानो वास्तविक मछलियाँ गंदे नए पानी को पी रही हों।
पदच्छेदः
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| मत्स्य-ध्वजाः | मत्स्य–ध्वज (१.३) | the fish-banners |
| वायु-वशात् | वायु–वशात् | due to the force of the wind |
| विदीर्णैः | विदीर्ण (वि√दृ+क्त, ३.३) | with torn open |
| मुखैः | मुख (३.३) | mouths |
| प्रवृद्ध-ध्वजिनी-रजांसि | प्रवृद्ध–ध्वजिनी–रजस् (२.३) | the thick dust of the army |
| बभुः | बभुः (√भा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | appeared |
| पिबन्तः | पिबत् (√पा+शतृ, १.३) | drinking |
| परमार्थ-मत्स्याः | परमार्थ–मत्स्य (१.३) | real fish |
| पर्याविलानि | पर्याविल (२.३) | turbid |
| इव | इव | as if |
| नव-उदकानि | नव–उदक (२.३) | new waters |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | त्स्य | ध्व | जा | वा | यु | व | शा | द्वि | दी | र्णै |
| र्मु | खैः | प्र | वृ | द्ध | ध्व | जि | नी | र | जां | सि |
| ब | भुः | पि | ब | न्तः | प | र | मा | र्थ | म | त्स्याः |
| प | र्या | वि | ला | नी | व | न | वो | द | का | नि |
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