ततो धनुष्कर्षणमूढहस्त-
मेकांसपर्यस्तशिरस्त्रजालम् ।
तस्थौ ध्वजस्तम्भनिषण्णदेहं
निद्राविधेयं नरदेवसैन्यम् ॥
ततो धनुष्कर्षणमूढहस्त-
मेकांसपर्यस्तशिरस्त्रजालम् ।
तस्थौ ध्वजस्तम्भनिषण्णदेहं
निद्राविधेयं नरदेवसैन्यम् ॥
मेकांसपर्यस्तशिरस्त्रजालम् ।
तस्थौ ध्वजस्तम्भनिषण्णदेहं
निद्राविधेयं नरदेवसैन्यम् ॥
अन्वयः
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ततः निद्रा-विधेयम् नरदेव-सैन्यम् धनुः-कर्षण-मूढ-हस्तम्, एक-अंस-पर्यस्त-शिरस्त्र-जालम्, ध्वज-स्तम्भ-निषण्ण-देहम् (सत्) तस्थौ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तत इति॥ ततो धनुष्कर्षणे चापकर्षणे मूढहस्तमव्यापृतहस्तम्। एकस्मिन्नंसे पर्यस्तं स्रस्तं शिरस्त्राणां शीर्षण्यानां जालं समूहो यस्य तत्। ध्वजस्तम्भेषु निषण्णा अवष्टब्धा देहा यस्य तत्। नरदेवानां राज्ञां सेनैव सैन्यम्। चतुर्वर्ण्यादित्वात्स्वार्थे ष्यञ्प्रत्ययः। निद्राविधेयं निद्रापरतन्त्रं तस्थौ ॥
Summary
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Then, the army of the kings, overcome by sleep, stood still. Their hands were paralyzed in the act of drawing their bows, their helmets had slipped down onto one shoulder, and their bodies were leaning against their flagstaffs.
सारांश
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निद्रा के वशीभूत शत्रुओं की सेना की स्थिति ऐसी थी कि उनके हाथ धनुष खींचते हुए ही रुक गए, सिरों के कवच ढल गए और वे ध्वजदंडों के सहारे टिके रह गए।
पदच्छेदः
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| ततः | ततः | Then |
| धनुष्कर्षणमूढहस्तम् | धनुस्–कर्षण–मूढ–हस्त (२.१) | with hands paralyzed in drawing the bow |
| एकांसपर्यस्तशिरस्त्रजालम् | एक–अंस–पर्यस्त–शिरस्त्र–जाल (२.१) | with helmets slipped down to one shoulder |
| तस्थौ | तस्थौ (√स्था कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | stood still |
| ध्वजस्तम्भनिषण्णदेहम् | ध्वजस्तम्भ–निषण्ण–देह (२.१) | with bodies leaning on flagstaffs |
| निद्राविधेयम् | निद्रा–विधेय (१.१) | subject to sleep |
| नरदेवसैन्यम् | नरदेव–सैन्य (१.१) | the army of the kings |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तो | ध | नु | ष्क | र्ष | ण | मू | ढ | ह | स्त |
| मे | कां | स | प | र्य | स्त | शि | र | स्त्र | जा | लम् |
| त | स्थौ | ध्व | ज | स्त | म्भ | नि | ष | ण्ण | दे | हं |
| नि | द्रा | वि | धे | यं | न | र | दे | व | सै | न्यम् |
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