तमरण्यसमाश्रयोमन्मुखं शिरसा वेष्टनशोभिना सुतः । पितरं प्रणिपत्य पादयोरपरित्यागमयाचतात्मनः ॥

अन्वयः AI सुतः (अजः) अरण्य-समाश्रय-उन्मुखम् तम् पितरम् पादयोः प्रणिपत्य, वेष्टन-शोभिना शिरसा आत्मनः अपरित्यागम् अयाचत ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) तमिति॥ अरण्यसमाश्रयोन्मुखं वनवासोद्युक्तं पितरं तं रघुं सुतोऽजः। वेष्टनशोभिनोष्णीषमनोहरेण शिरसा पादयोः प्रणिपत्य। आत्मनोऽपरित्यागमयाचत। मां परित्यज्य न गन्तव्यमिति प्रार्थितवानित्यर्थः ॥
Summary AI His son (Aja), bowing at the feet of his father who was inclined to take refuge in the forest, and with his head still adorned with the royal turban, begged him not to abandon him (i.e., to let him serve him).
सारांश AI वन जाने को उद्यत पिता के चरणों में मुकुटधारी पुत्र अज ने सिर झुकाकर प्रार्थना की कि वे उन्हें छोड़कर न जाएं।
पदच्छेदः AI
तम्तद् (२.१) him
अरण्यसमाश्रयोन्मुखम्अरण्यसमाश्रयउन्मुख (२.१) who was inclined to take refuge in the forest
शिरसाशिरस् (३.१) with his head
वेष्टनशोभिनावेष्टनशोभिन् (३.१) adorned with a turban
सुतःसुत (१.१) the son
पितरम्पितृ (२.१) the father
प्रणिपत्यप्रणिपत्य (प्र+नि√पत्+ल्यप्) having bowed down
पादयोःपाद (७.२) at the feet
अपरित्यागम्अपरित्याग (२.१) non-abandonment
अयाचतअयाचत (√याच् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) begged for
आत्मनःआत्मन् (६.१) of himself
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