अन्वयः
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अचिरेश्वरः (अजः) क्षितौ द्विषत्-आरम्भ-फलानि भस्मसात् अकरोत् । इतरः (रघुः) ज्ञानमयेन वह्निना स्वकर्मणां दहने ववृते ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अकरोदिति॥ अचिरेश्वरोऽजः क्षितौ द्विषतामारम्भाः कर्माणि तेषां फलानि भस्मसादकरोत् कार्त्स्न्येन भस्मीकृतवान्।
विभाषा साति कार्त्स्न्ये (अष्टाध्यायी ५.४.५२ ) इति सातिप्रत्ययः। इतरो रघुर्ज्ञानमयेन आत्मज्ञानप्रचुरेण वह्निना पावकेन करणेन स्वकर्मणां भवबीजभूतानां दहने भस्मीकरणे ववृते। स्वकर्माणि दग्धुं प्रघृत्त इत्यर्थः। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुतेऽर्जन इति गीतावचनात्॥
Summary
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Aja, the new king, swiftly reduced the results of his enemies' efforts to ashes on earth. The other, Raghu, engaged himself in burning his own karmas in the fire of supreme knowledge.
सारांश
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नए राजा अज ने पृथ्वी पर शत्रुओं के प्रयासों को धूल में मिला दिया, जबकि रघु ने ज्ञानरूपी अग्नि से अपने समस्त कर्मों को भस्म कर दिया।
पदच्छेदः
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| अकरोत् | अकरोत् (√कृ कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made |
| अचिरेश्वरः | अचिर–ईश्वर (१.१) | the recent lord (Aja) |
| क्षितौ | क्षिति (७.१) | on the earth |
| द्विषदारम्भफलानि | द्विषत्–आरम्भ–फल (२.३) | the fruits of the undertakings of his enemies |
| भस्मसात् | भस्मसात् | to ashes |
| इतरः | इतर (१.१) | the other (Raghu) |
| दहने | दहन (७.१) | in the burning |
| स्वकर्मणां | स्व–कर्मन् (६.३) | of his own actions |
| ववृते | ववृते (√वृत् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was engaged |
| ज्ञानमयेन | ज्ञान–मय (३.१) | made of knowledge |
| वह्निना | वह्नि (३.१) | by the fire |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | क | रो | द | चि | रे | श्व | रः | क्षि | तौ | |
| द्वि | ष | दा | र | म्भ | फ | ला | नि | भ | स्म | सात् |
| इ | त | रो | द | ह | ने | स्व | क | र्म | णां | |
| व | वृ | ते | ज्ञा | न | म | ये | न | व | ह्नि | ना |
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