अन्वयः
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स्थिरकर्मा नवः प्रभुः (अजः) आ फलोदयात् कर्मणः न विरराम । स्थिरधीः नवेतरः (रघुः) च आ परमात्म-दर्शनात् योग-विधेः न (विरराम) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
नेति॥ स्थिरकर्मा फलोदयकर्मकारी नवः प्रभुरज आ फलोदयात् फलसिद्धिपर्यन्तं कर्मण आरम्भान्न विरराम न निवृत्तः। जुगुप्साविरामप्रमादार्थानामुपसंख्यानम्
(वा.१०७९) इत्यपादानात्पञ्चमी। व्याङ्परिभ्यो रमः` (अष्टाध्यायी १.३.८३ ) इति परस्मैपदम्। स्थिरधीर्निश्चलचित्तो नवेतरो रघुश्चापरमात्मदर्शनात् परमात्मसाक्षात्कारपर्यन्तं योगविधेरैक्यानुसंधानान्न विरराम ॥
Summary
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The new lord, Aja, resolute in his actions, did not cease from his work until its fruit was achieved. And the other, Raghu, of steady intellect, did not desist from the practice of yoga until he had realized the Supreme Self.
सारांश
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नए राजा अज फल मिलने तक अपने कर्मों से नहीं हटे और रघु परमात्मा के दर्शन होने तक अपने योग मार्ग से विचलित नहीं हुए।
पदच्छेदः
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| न | न | not |
| नवः | नव (१.१) | the new |
| प्रभुः | प्रभु (१.१) | lord |
| आ | आ | until |
| फलोदयात् | फल–उदय (५.१) | from the rising of the fruit |
| स्थिरकर्मा | स्थिर–कर्मन् (१.१) | one of steady actions |
| विरराम | विरराम (वि√रम् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | desisted |
| कर्मणः | कर्मन् (५.१) | from the action |
| न | न | not |
| च | च | and |
| योगविधेः | योग–विधि (५.१) | from the practice of yoga |
| नवेतरः | नव–इतर (१.१) | the one other than the new (Raghu) |
| स्थिरधीः | स्थिर–धी (१.१) | one of steady intellect |
| आ | आ | until |
| परमात्मदर्शनात् | परम–आत्मन्–दर्शन (५.१) | from the vision of the Supreme Self |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | न | वः | प्र | भु | रा | फ | लो | द | या | |
| त्स्थि | र | क | र्मा | वि | र | रा | म | क | र्म | णः |
| न | च | यो | ग | वि | धे | र्न | वे | त | रः | |
| स्थि | र | धी | रा | प | र | मा | त्म | द | र्श | नात् |
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