अन्वयः
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सः सत्-अर्थ-वेदिभिः परार्ध्य-गतेः पितुः अशोच्यताम् उद्दिश्य शमित-आधिः अधि-ज्य-कार्मुकः (सन्) जगत् अप्रति-शासनं कृतवान् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
स इति॥ परार्ध्यगतेः प्रशस्तगतेः प्राप्तमोक्षस्य पितुरशोच्यतामशोचनीयत्वमुद्दिश्याभिसंधाय। शोको न कर्तव्य इत्युपदिश्येत्यर्थः। सदर्थविदिभिः परमार्थज्ञैर्विद्वद्भिः शमिताधिर्निवारितमनोव्यथः।
पुंस्याधिर्मानसी व्यथा इत्यमरः (अमरकोशः १.७.३० ) । सोऽजोऽधिज्यकार्मुकः अधिज्यमारोपितमौर्वीकं कार्मुकं यस्य स तथोक्तः सन्। जगत् कर्मभूतमप्रतिशासनं द्वितीयाज्ञारहितम्। आत्माज्ञाविधेयमित्यर्थः। कृतवांश्चकार ॥
Summary
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Advised by those who know the truth about the unlamentable state of his father who had attained the highest goal, he (Aja) suppressed his mental anguish. With his bow strung, he made the world free from any rival command.
सारांश
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पिता की उत्तम गति को जानकर विद्वानों के समझाने पर अज ने शोक त्यागा और धनुष उठाकर पृथ्वी पर निष्कंटक शासन किया।
पदच्छेदः
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| स | तद् (१.१) | he (Aja) |
| परार्ध्यगतेः | परार्ध्य–गति (६.१) | of him who had attained the highest state |
| अशोच्यतां | अशोच्यता (२.१) | the state of being unlamentable |
| पितुः | पितृ (६.१) | of his father |
| उद्दिश्य | उद्दिश्य (उद्√दिश्+ल्यप्) | having been advised about |
| सदर्थवेदिभिः | सत्–अर्थ–वेदिन् (३.३) | by those who know the true meaning |
| शमिताधिरधिज्यकार्मुकः | शमित-आधि–अधिज्य-कार्मुक (१.१) | having suppressed his anguish and strung his bow |
| कृतवान् | कृतवत् (√कृ+क्तवतु, १.१) | made |
| अप्रतिशासनं | अप्रति–शासन (२.१) | without a rival command |
| जगत् | जगत् (२.१) | the world |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | प | रा | र्ध्य | ग | ते | र | शो | च्य | तां | |
| पि | तु | रु | द्दि | श्य | स | द | र्थ | वे | दि | भिः |
| श | मि | ता | धि | र | धि | ज्य | का | र्मु | कः | |
| कृ | त | वा | न | प्र | ति | शा | स | नं | ज | गत् |
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