सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
स इति॥ अवेक्षितप्रजोऽकुतोभयत्वेनानुसंहितप्रजः।नित्यमसिच्प्रजामेधयोः (अष्टाध्यायी ५.४.१२२ ) इत्यसिच्प्रत्ययः। न केवलं स्त्रैण इति भावः। शोभना प्रजा यस्यासा सुप्रजाः सुपुत्रवान्। पुत्रन्यस्तभार इति भावः। सोऽजः कदाचिद्देव्या महिष्येन्दुमत्या सह नगरोपवने। नन्दने नन्दनाख्येऽमरावत्युपकण्ठवने शचीसखः। शच्या सहेत्यर्थः। मरुतां देवानां पालयितेन्द्र इव। विजहार चिक्रीड॥
पदच्छेदः
| सः | तद् (१.१) | he (Aja) |
| कदाचित् | कदाचित् | once |
| अवेक्षितप्रजः | अवेक्षित–प्रजा (१.१) | one who had delegated the care of his subjects |
| सह | सह | with |
| देव्या | देवी (३.१) | his queen (Indumati) |
| विजहार | विजहार (वि√हृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | sported |
| सुप्रजाः | सु–प्रजा (१.१) | blessed with a good son |
| नगरोपवने | नगर–उपवन (७.१) | in the city garden |
| शचीसखः | शची–सखि (१.१) | the companion of Shachi (Indra) |
| मरुतां | मरुत् (६.३) | of the gods |
| पालयिता | पालयितृ (१.१) | the protector |
| इव | इव | like |
| नन्दने | नन्दन (७.१) | in the Nandana garden |
छन्दः
वियोगिनी []छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | क | दा | चि | द | वे | क्षि | त | प्र | जः | |
| स | ह | दे | व्या | वि | ज | हा | र | सु | प्र | जाः |
| न | ग | रो | प | व | ने | श | ची | स | खो | |
| म | रु | तां | पा | ल | यि | ते | व | न | न्द | ने |