अन्वयः
AI
अथ नारदः दक्षिण-उदधेः रोधसि श्रित-गोकर्ण-निकेतम् ईश्वरम् उपवीणयितुं रवेः उदय-आवृत्ति-पथेन ययौ ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अथेति॥ अथ दक्षिणस्योदधेः समुद्रस्य रोधसि तीरे श्रितगोकर्णनिकेतमधिष्ठितगोकर्णाख्यस्थानमीश्वरं शिवमुपवीणयितुं वीणयोप समीपे गातुम्।
सत्यापाश- (अष्टाध्यायी ३.१.२५ ) इत्यादिना वीणाशब्दादुपगानार्थे णिच्प्रत्ययः। ततस्तुमुन्। नारदो देवर्षी रवेः सूेर्यस्य संबन्धिना। उदयावृत्तिपथेनाकाशमार्गेण ययौ जगाम। सूर्योपमानेनास्यातितेजस्त्वमुच्यते ॥
Summary
AI
Then, the sage Narada, traveling through the sky by the path of the sun, went to the shore of the southern ocean to praise Lord Shiva, whose abode is the famed Gokarna shrine, by playing his Vina.
सारांश
AI
एक बार देवर्षि नारद दक्षिण समुद्र के तट पर स्थित गोकर्णेश्वर महादेव की स्तुति करने के लिए आकाश मार्ग से जा रहे थे।
पदच्छेदः
AI
| अथ | अथ | then |
| रोधसि | रोधस् (७.१) | on the shore |
| दक्षिणोदधेः | दक्षिण–उदधि (६.१) | of the southern ocean |
| श्रितगोकर्णनिकेतम् | श्रित–गोकर्ण–निकेत (२.१) | Him whose abode is the famed Gokarna |
| ईश्वरम् | ईश्वर (२.१) | Lord (Shiva) |
| उपवीणयितुं | उपवीणयितुम् (√उपवीणय्+तुमुन्) | to praise with the Vina |
| ययौ | ययौ (√या कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | went |
| रवेः | रवि (६.१) | of the sun |
| उदयावृत्तिपथेन | उदय–आवृत्ति–पथ (३.१) | by the path of rising and setting |
| नारदः | नारद (१.१) | Narada |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | रो | ध | सि | द | क्षि | णो | द | धेः | |
| श्रि | त | गो | क | र्ण | नि | के | त | मी | श्व | रम् |
| उ | प | वी | ण | यि | तुं | य | यौ | र | वे | |
| रु | द | या | वृ | त्ति | प | थे | न | ना | र | दः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.