अन्वयः
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कुसुम-अनुसारिभिः भ्रमरैः परिकीर्णा मुनेः परिवादिनी पवन-अवक्षेप-जम् अञ्जन-आविलम् बाष्पम् सृजती इव ददृशे ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
भ्रमरैरिति॥ कुसुमानुसारिभिः पुष्पानुयायिभिर्भ्रमरैरलिभिः परिकीर्णा व्याप्ता मुनेर्नारदस्य परिवादिनी वीणा
वीणा तु वल्लकी। विपञ्ची सा तु तन्त्रीभिः सप्तभिः परिवादिनी॥ इत्यमरः (अमरकोशः १.७.४ ) । पवनस्य वायोरवलेपोऽधिक्षेपस्तज्जमञ्जनेन कज्जलेनाविलं कलुषं बाष्पमश्रु सृजतीव मुञ्चतीव। ददृशे दृष्टा। भ्रमराणां साञ्जनबाष्पबिन्दुसादृश्यं विवक्षितम्। वा नपुंसकस्य (अष्टाध्यायी ७.१.७९ ) इति वर्तमाने आच्छीनद्योर्नुम् (अष्टाध्यायी ७.१.८० ) इति नुम्विकल्पः ॥
Summary
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The sage's Vina, surrounded by bees that were following the flowers (of the snatched garland), was seen as if shedding tears, dark like collyrium, born from being tossed about by the wind.
सारांश
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भौरों से घिरी वह दिव्य माला वीणा से गिरते समय ऐसी लग रही थी मानो वीणा वायु के आघात से काजल युक्त काले आँसू बहा रही हो।
पदच्छेदः
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| भ्रमरैः | भ्रमर (३.३) | by bees |
| कुसुमानुसारिभिः | कुसुम–अनुसारिन् (३.३) | following the flowers |
| परिकीर्णा | परिकीर्ण (परि√कॄ+क्त, १.१) | surrounded |
| परिवादिनी | परिवादिनी (१.१) | the Vina |
| मुनेः | मुनि (६.१) | of the sage |
| ददृशे | ददृशे (√दृश् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was seen |
| पवनावलेपजं | पवन–अवक्षेप–ज (२.१) | born from the tossing by the wind |
| सृजती | सृजन्ती (√सृज्+शतृ, १.१) | shedding |
| बाष्पम् | बाष्प (२.१) | tears |
| इव | इव | as if |
| अञ्जनाविलम् | अञ्जन–आविल (२.१) | dark like collyrium |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भ्र | म | रैः | कु | सु | मा | नु | सा | रि | भिः | |
| प | रि | की | र्णा | प | रि | वा | दि | नी | मु | नेः |
| द | दृ | शे | प | व | ना | व | ले | प | जं | |
| सृ | ज | ती | बा | ष्प | मि | वा | ञ्ज | ना | वि | लम् |
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