अन्वयः
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मया तव मनसा अपि विप्रियम् न कृत-पूर्वम् । माम् किम् जहासि? ननु अहम् क्षितेः शब्द-पतिः, (किन्तु) मे रतिः त्वयि भाव-निबन्धना ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
मनसेति॥ मया मनसापि तव विप्रियं न कृतपूर्वम्। पूर्वं न कृतमित्त्यर्थः। सुप्सुपेति समासः। किं केन निमित्तेन मां जहासि त्यजसि? नन्वहं क्षितेः शब्दपतिः शब्दत एव पतिः। न त्वर्थत इत्यर्थः। भावनिबन्धनाऽभिप्रायनिबन्धना स्वाभावहेतुका मे रतिः, प्रेम तु त्वय्येव। अस्तीति शेषः ॥
Summary
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I have never done anything to displease you, even in thought. Why do you abandon me? Surely, I am the lord of the earth in name only; my real love is founded on deep affection for you.
सारांश
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मैंने मन से भी कभी तुम्हारा अहित नहीं किया, फिर तुम मुझे क्यों त्याग रही हो? मैं पृथ्वी का केवल नाम का स्वामी हूँ, मेरा वास्तविक अनुराग तो केवल तुममें ही है।
पदच्छेदः
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| मनसा | मनस् (३.१) | by mind |
| अपि | अपि | even |
| न | न | not |
| विप्रियम् | विप्रिय (१.१) | anything displeasing |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| कृतपूर्वम् | कृत (√कृत+क्त)–पूर्व (१.१) | done before |
| तव | युष्मद् (६.१) | to you |
| किम् | किम् | why |
| जहासि | जहासि (√हा कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | do you abandon |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| ननु | ननु | Surely |
| शब्दपतिः | शब्द–पति (१.१) | a lord in name only |
| क्षितेः | क्षिति (६.१) | of the earth |
| अहम् | अस्मद् (१.१) | I |
| त्वयि | युष्मद् (७.१) | in you |
| मे | अस्मद् (६.१) | my |
| भावनिबन्धना | भाव–निबन्धना (१.१) | is founded on deep affection |
| रतिः | रति (१.१) | love |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | न | सा | पि | न | वि | प्रि | यं | म | या | |
| कृ | त | पू | र्वं | त | व | किं | ज | हा | सि | माम् |
| न | नु | श | ब्द | प | तिः | क्षि | ते | र | हं | |
| त्व | यि | मे | भा | व | नि | ब | न्ध | ना | र | तिः |
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