अन्वयः
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वाम-ऊरु! ते यत् मृदु अङ्गम् नव-पल्लव-संस्तरे अपि अर्पितम् (सत्) दूयेत, तत् इदम् (अङ्गम्) चिता-अधिरोहणम् कथम् विषहिष्यते? वद ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
नवेति॥ नवपल्लवसंस्तरे नूतनप्रवालास्तरणेऽप्यर्पितं स्थापितं मृदु ते तव यदङ्गं शरीरं दूयेत परिपप्तं भवेत्। वामौ सुन्दरौ ऊरू यस्याः सा हे वामोरु।
वामं स्यात्सुन्दरे सव्ये इति केशवः। संहितशफलक्षण- इत्यादिनोङ्प्रत्ययः। तदिदमङ्गं चितायाः काष्ठसंचयस्याधिरोहणं कथं विषहिष्यते वद ॥
Summary
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O you with beautiful thighs! Tell me, how will this delicate body of yours, which would feel pain even when placed on a bed of fresh sprouts, endure the mounting of the funeral pyre?
सारांश
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हे सुंदरी! तुम्हारे जो कोमल अंग नवीन पत्तों की शय्या पर भी कष्ट पाते थे, वे अब चिता की भीषण अग्नि को भला कैसे सहन करेंगे?
पदच्छेदः
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| नवपल्लवसंस्तरे | नव–पल्लव–संस्तर (७.१) | on a bed of fresh sprouts |
| अपि | अपि | even |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| मृदु | मृदु (१.१) | delicate |
| दूयेत | दूयेत (√दू कर्तरि विधिलिङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | would feel pain |
| यत् | यद् (१.१) | which |
| अङ्गम् | अङ्ग (१.१) | body |
| अर्पितम् | अर्पित (√ऋ+णिच्+क्त, १.१) | placed |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| इदम् | इदम् (१.१) | this |
| विषहिष्यते | विषहिष्यते (वि√सह् कर्तरि लृट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | will endure |
| कथम् | कथम् | how |
| वद | वद (√वद् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | tell |
| वामोरु | वाम–ऊरु (८.१) | O you with beautiful thighs! |
| चिताधिरोहणम् | चिता–अधिरोहण (२.१) | the mounting of the funeral pyre |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | व | प | ल्ल | व | सं | स्त | रे | ऽपि | ते | |
| मृ | दु | दू | ये | त | य | द | ङ्ग | म | र्पि | तम् |
| त | दि | दं | वि | ष | हि | ष्य | ते | क | थं | |
| व | द | वा | मो | रु | चि | ता | धि | रो | ह | णम् |
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