अन्वयः
AI
किन्नरकण्ठि! तव निःश्वसित-अनुकारिभिः बकुलैः मया समम् अर्धचिताम् विलासमेखलाम् असमाप्य इदम् किम् सुप्यते?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तवेति॥ तव निःश्वसितानुकारिभिर्बकुलैर्बकुसुमैर्मया समं सार्धमर्धचितामर्धं यथा तथा रचितां विलासमेखलामसमाप्यापूरयित्वा। किंनरस्य देवयोनिविशेषस्य कण्ठ इव कण्ठो यस्यास्तत्संबुद्धिर्हे किन्नरकण्ठि!
अङ्गगात्रकण्ठेभ्यश्च इति ङीप्। किमिदं सुप्यते निद्रा क्रियते? वचिस्वपि- (अष्टाध्यायी ६.१.१५ ) इत्यादिना संप्रसारणम्। अनुचितमिदं स्वपनमित्यर्थः ॥
Summary
AI
"O you with a voice like a Kinnara! Why do you sleep like this, leaving the playful girdle half-woven with me, using Bakula flowers that imitate the fragrance of your sighs?"
सारांश
AI
तुम्हारी साँसों जैसी सुगंध वाले बकुल फूलों की आधी बनी करधनी को अधूरा छोड़कर हे कोकिलकण्ठी, तुम क्यों सो रही हो?
पदच्छेदः
AI
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| निःश्वसितानुकारिभिः | निःश्वसित–अनुकारिन् (३.३) | by those that imitate the sighs |
| बकुलैः | बकुल (३.३) | by the Bakula flowers |
| अर्धचिताम् | अर्ध–चिता (२.१) | half-woven |
| समम् | समम् | with |
| मया | अस्मद् (३.१) | me |
| असमाप्य | असमाप्य (न+सम्√आप्+ल्यप्) | without finishing |
| विलासमेखलाम् | विलास–मेखला (२.१) | the playful girdle |
| किम् | किम् | why |
| इदम् | इदम् | this |
| किन्नरकण्ठि | किन्नरकण्ठी (८.१) | O you with a voice like a Kinnara |
| सुप्यते | सुप्यते (√स्वप् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is it being slept (by you) |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | व | निः | श्व | सि | ता | नु | का | रि | भि | |
| र्ब | कु | लै | र | र्ध | चि | तां | स | मं | म | या |
| अ | स | मा | प्य | वि | ला | स | मे | ख | लां | |
| कि | मि | दं | कि | न्न | र | क | ण्ठि | सु | प्य | ते |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.