अन्वयः
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(अयम्) सखीजनः समदुःखसुखः, अयम् आत्मजः प्रतिपत्-चन्द्रनिभः, अहम् एकरसः (अस्मि) । तथापि ते व्यवसायः प्रतिपत्तिनिष्ठुरः (अस्ति) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
समेति॥ सखीजनः समदुःखसुखः, त्वद्दुःखेन दुःखी, त्वत्सुखेन सुखीत्यर्थः। अयमात्मजो बालः, प्रतिपञ्चन्द्रनिभः। दर्शनीयो वर्धिष्णुश्चेत्यर्थः।
प्रतिपत्शब्देन द्वितीया वक्षअयते; प्रतिपदि चन्द्रस्यादर्शनात्। अहमेकरसोऽभिन्नरामः। शृङ्गारादौ विषे वीर्ये गुणे रागे द्रवे रसः इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.२४२ ) । तथापि। जीवितसामग्रीसत्त्वेऽपीत्यर्थः। ते तव व्यवसायोऽस्मत्परित्यागरूपो व्यापारः प्रतिपत्त्या निश्चयेन निष्ठुरः क्रूरः। प्रतिपत्तिः पदप्राप्तौ प्रकृतौ गौरवेऽपि च। प्रागल्भ्ये च प्रबोधे च इति विश्वः। स्मर्तुं न् शक्यः किमुताधिकर्तुमिति भावः ॥
Summary
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"Your friends share my sorrow and joy, this son of ours is like the new moon, and I am ever devoted to you. Despite all this, your decision (to depart) is cruel in its consequence."
सारांश
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समान दुख-सुख वाली सखियाँ और चंद्रमा के समान बढ़ता हुआ पुत्र होने पर भी तुम्हारा प्राण त्यागना अत्यंत निष्ठुर निर्णय है।
पदच्छेदः
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| समदुःखसुखः | सम–दुःख–सुख (१.१) | who shares sorrow and joy |
| सखीजनः | सखी–जन (१.१) | the group of friends |
| प्रतिपच्चन्द्रनिभः | प्रतिपत्–चन्द्र–निभ (१.१) | like the new moon |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| आत्मजः | आत्मज (१.१) | son |
| अहम् | अस्मद् (१.१) | I |
| एकरसः | एक–रस (१.१) | am solely devoted |
| तथापि | तथापि | yet |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| व्यवसायः | व्यवसाय (१.१) | decision |
| प्रतिपत्तिनिष्ठुरः | प्रतिपत्ति–निष्ठुर (१.१) | is cruel in its consequence |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | म | दुः | ख | सु | खः | स | खी | ज | नः | |
| प्र | ति | प | ञ्च | न्द्र | नि | भो | ऽय | मा | त्म | जः |
| अ | ह | मे | क | र | स | स्त | था | पि | ते | |
| व्य | व | सा | यः | प्र | ति | पा | त्ति | नि | ष्ठु | रः |
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