गृहीणी सचिवः सखी मिथः प्रियशिष्या ललिते कलाविधौ । करुणाविमुखेन मृत्युना हरता त्वां वद किं न मे हृतम् ॥
गृहीणी सचिवः सखी मिथः प्रियशिष्या ललिते कलाविधौ । करुणाविमुखेन मृत्युना हरता त्वां वद किं न मे हृतम् ॥
अन्वयः
AI
(त्वम्) गृहिणी, सचिवः, मिथः सखी, ललिते कलाविधौ प्रियशिष्या (आसीः) । करुणाविमुखेन मृत्युना त्वाम् हरता मे किम् न हृतम्? वद ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
गृहीणीति॥ त्वमेव गृहिणी दाराः। अनेन सर्वं कुटुम्बं त्वदाश्रयमिति भावः। सचिवो बुद्धिसहायो मन्त्री। सर्वो हितोपदेशस्त्वदायत्त इत्यनेनोच्यते। मिथो रहसि सखी नर्मसचिवः। सर्वोपभागस्त्वदाश्रय इत्यमुना प्रकटितम्। ललिते मनोहरे कलाविधौ वादित्रादिचतुःषष्टिकलाप्रयोगे प्रियशिष्या। प्रियत्वं प्राज्ञत्वादित्यभिसंधिः। सर्वानन्दोऽनेन त्वन्निबन्धन इत्युद्वाटितम्। अतस्त्वां समष्टिरूपां हरताऽत एव करुणाविमुखेन कृपाशून्येन मृत्युना मे मत्संबन्धि किं वत्सु न हृतं वद। सर्वमपि हृतमित्यर्थः ॥
Summary
AI
"You were my wife, my counselor, my intimate friend, and my beloved student in the fine arts. Tell me, what has not been taken from me by cruel Death, who has snatched you away?"
सारांश
AI
तुम मेरी गृहणी, मंत्री, सखी और ललित कलाओं की प्रिय शिष्या थी; मृत्यु ने तुम्हें छीनकर मेरा सर्वस्व ही हर लिया है।
पदच्छेदः
AI
| गृहिणी | गृहिणी (१.१) | Wife |
| सचिवः | सचिव (१.१) | counselor |
| सखी | सखी (१.१) | friend |
| मिथः | मिथस् | in private |
| प्रियशिष्या | प्रिय–शिष्या (१.१) | beloved pupil |
| ललिते | ललित (७.१) | in the fine |
| कलाविधौ | कला–विधि (७.१) | arts |
| करुणाविमुखेन | करुणा–विमुख (३.१) | by the one averse to compassion |
| मृत्युना | मृत्यु (३.१) | by Death |
| हरता | हरत् (√हृ+शतृ, ३.१) | who snatches away |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| वद | वद (√वद् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | tell me |
| किम् | किम् (१.१) | what |
| न | न | not |
| मे | अस्मद् (६.१) | from me |
| हृतम् | हृत (√हृ+क्त, १.१) | has been taken |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.