अन्वयः
AI
इति प्रियाम् प्रति करुणार्थग्रथितम् विलपन् कोसलाधिपः पृथिवीरुहान् अपि स्रुतशाखारसबाष्पदूषितान् अकरोत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
विलपन्निति॥ कोसलानामधिपोऽज इति करुणः शोकरसः स एवार्थस्तेन ग्रथितं संबद्धं यथा तथा प्रियां प्रतीन्दुमतीमुद्दिश्य विलपन्, पृथिवीरुहान् वृक्षानपि स्रुताः शाखारसा मकरन्दा एव बाष्पास्तैर्दूषितानकरोत्। अचेतनानप्यरोदयदित्यर्थः ॥
Summary
AI
"Lamenting thus towards his beloved with words woven with pathos, the lord of Kosala made even the trees stained with tears, which were the sap flowing from their branches."
सारांश
AI
राजा अज के इस करुण विलाप को सुनकर वृक्षों ने भी टहनियों से रिसते रस के रूप में आँसू बहाकर अपना दुख व्यक्त किया।
पदच्छेदः
AI
| विलपन् | विलपत् (वि√लप्+शतृ, १.१) | lamenting |
| इति | इति | thus |
| कोसलाधिपः | कोसल–अधिप (१.१) | the lord of Kosala |
| करुणार्थग्रथितम् | करुण–अर्थ–ग्रथित (२.१) | woven with pathos |
| प्रियाम् | प्रिया (२.१) | beloved |
| प्रति | प्रति | towards |
| अकरोत् | अकरोत् (√कृ कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made |
| पृथिवीरुहान् | पृथिवी–रुह् (२.३) | the trees |
| अपि | अपि | even |
| स्रुतशाखारसबाष्पदूषितान् | स्रुत–शाखा–रस–बाष्प–दूषित (२.३) | stained with tears of flowing branch-sap |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | ल | प | न्नि | ति | को | स | ला | धि | पः | |
| क | रु | णा | र्थ | ग्र | थि | तं | प्रि | यां | प्र | ति |
| अ | क | रो | त्पृ | थि | वी | रु | हा | न | पि | |
| स्रु | त | शा | खा | र | स | बा | ष्प | दू | षि | तान् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.