अन्वयः
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अथ स्वजनः तस्य अङ्कतः ताम् सुन्दरीम् कथञ्चित् अपनीय, तत् अन्त्यमण्डनाम् अगुरुचन्दनैधसे अनलाय विससर्ज ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अथेति॥ अथ स्वजनो बन्धुवर्गः। तस्याजस्याङ्कत उत्सङ्गात् कथंचिदपिनीय। तद्दिव्यकुसुममेवान्त्यं मण्डनमलंकारो यस्यास्ताम्। तां सुन्दरीमगुरूणि चन्दनान्येधांसीन्धनानि यस्य तस्मा अनलायाग्नये विससर्ज विसृष्टवान्।
क्रियाग्रहणमपि कर्तव्यम् इति क्रियामात्रप्रयोगे संप्रदानत्वाञ्चतुर्थी ॥
Summary
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"Then, his kinsmen, with some difficulty, removed the beautiful lady, who was now adorned for her final rites, from his lap and consigned her to the fire fueled with aloe and sandalwood."
सारांश
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परिजनों ने विलाप करते राजा की गोद से इंदुमती के शव को हटाया और अगरु-चंदन की लकड़ियों से उसका अंतिम संस्कार किया।
पदच्छेदः
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| अथ | अथ | Then |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| कथञ्चित् | कथञ्चित् | with some difficulty |
| अङ्कतः | अङ्क (+तसिल्) | from the lap |
| स्वजनः | स्व–जन (१.१) | his kinsmen |
| ताम् | तद् (२.१) | her |
| अपनिय | अपनीय (अप√नी+ल्यप्) | having removed |
| सुन्दरीम् | सुन्दरी (२.१) | the beautiful one |
| विससर्ज | विससर्ज (वि√सृज् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | consigned |
| तदन्त्यमण्डनाम् | तत्–अन्त्य–मण्डना (२.१) | her who had her final adornments |
| अनलाय | अनल (४.१) | to the fire |
| अगुरुचन्दनैधसे | अगुरु–चन्दन–एधस् (४.१) | which was fueled with aloe and sandalwood |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | त | स्य | क | थं | चि | द | ङ्क | तः | |
| स्व | ज | न | स्ता | म | प | नी | य | सु | न्द | रीम् |
| वि | स | स | र्ज | त | द | न्त्य | म | ण्ड | ना | |
| म | न | ला | या | गु | रु | च | न्द | नै | ध | से |
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