अन्वयः
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तया विना क्षणदा-अपाय-शशाङ्क-दर्शनः सः, स्वशुचः परिवाहम् इव पौरवधू-मुख-अश्रुषु अवलोकयन्, पुरीम् विवेश ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
स इति॥ तयेन्दुमत्या विना। क्षणदाया रात्रेरपायेऽपगमे यः शशाङ्कश्चन्द्रः स इव दृश्यत इति क्षणदापायशशाङ्कदर्शनः। प्रातःकालिकचन्द्र इव दृश्यमान इत्यर्थः। दृश्यत इति कर्मार्थे ल्युट्। सोऽजः पौरवधूमुखाश्रुषु स्वशुचः स्वशोकस्य परिवाहं जलोच्छ्वासमिवावलोकयन्।
जलोच्छ्वासाः परीवाहाः इत्यमरः (अमरकोशः १.१०.१० ) । स्वदुःखपूरातिशयमिव पश्यन् पुरीं विवेश। वधूग्रहणात्तस्यामिन्दुमत्यां सख्याभिमानादजसमानदुःखसूचकपरीवाहोक्तिर्निर्वहति ॥
Summary
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"Without her, he, whose appearance was like the moon at the end of the night, entered the city, seeing an overflow of his own grief, as it were, in the tears on the faces of the city women."
सारांश
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रानी के बिना नगर में प्रवेश करते राजा प्रातःकाल के चंद्रमा के समान फीके लग रहे थे और प्रजा के अश्रुओं में अपना ही दुख देख रहे थे।
पदच्छेदः
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| सः | तद् (१.१) | He |
| विवेश | विवेश (√विश् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | entered |
| पुरीम् | पुरि (२.१) | the city |
| तया | तद् (३.१) | her |
| विना | विना | without |
| क्षणदापायशशाङ्कदर्शनः | क्षणदा–अपाय–शशाङ्क–दर्शन (१.१) | whose appearance was like the moon at the end of the night |
| परिवाहम् | परिवाह (२.१) | an overflow |
| इव | इव | as it were |
| अवलोकयन् | अवलोकयत् (अव√लोक्+शतृ, १.१) | seeing |
| स्वशुचः | स्व–शुच् (६.१) | of his own grief |
| पौरवधूमुखाश्रुषु | पौर–वधू–मुख–अश्रु (७.३) | in the tears on the faces of the city women |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | वि | वे | श | पु | रीं | त | या | वि | ना | |
| क्ष | ण | दा | पा | य | श | शा | ङ्क | द | र्श | नः |
| प | रि | वा | ह | मि | वा | व | लो | क | य | |
| न्स्व | शु | चः | पौ | र | व | धू | मु | खा | श्रु | षु |
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