अन्वयः
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'भगवन्! अयम् जनः परवान् (अस्ति), मे प्रतिकूल-आचरितम् क्षमस्व' इति च उपनताम् क्षिति-स्पृशम् ताम् आसुर-पुष्प-दर्शनात् (शापान्तम्) कृतवान् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
भगवन्निति॥ हे भगवन्महर्षे! अयं जनः। परोऽस्यास्तीति स्वामित्वेन परवान् पराधीनः।
अयम् इत्यात्मनिर्देशः। अहं पराधीनेत्यर्थः। मे मम प्रतिकूलाचरितमपरराधं क्षमस्वेत्यनेन प्रकारेणोपनतां शरणागतां च हरिणीमा सुरपुष्पदर्शनात् पुष्पदर्शनपर्यन्तम्। क्षितिं स्पृशतीति क्षितिस्पृक्, तां क्षितिस्पृशं मानुषीं कृतवानकरोत्। दिव्यपुष्पदर्शनं शापावधिरित्यनुगृहीतवानित्यर्थः ॥
Summary
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'O Lord, this person is dependent; please forgive my offensive conduct.' To her who said this and bowed, touching the earth, he granted an end to the curse, making it last until she would see a divine flower.
सारांश
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"हे भगवन! मैं पराधीन हूँ, मेरे प्रतिकूल आचरण को क्षमा करें।" ऐसा कहकर राजा अज ने दिव्य पुष्पों को देखते ही भूमि का स्पर्श करते हुए प्रणाम किया।
पदच्छेदः
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| भगवन् | भगवत् (८.१) | O Lord! |
| परवान् | परवत् (१.१) | is dependent |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| जनः | जन (१.१) | person |
| प्रतिकूल-आचरितम् | प्रतिकूल–आचरित (२.१) | unfavorable conduct |
| क्षमस्व | क्षमस्व (√क्षम् कर्तरि लोट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | forgive |
| मे | अस्मद् (६.१) | my |
| इति | इति | thus |
| च | च | and |
| उपनताम् | उपनत (उप√नम्+क्त, २.१) | her who had approached |
| क्षिति-स्पृशम् | क्षिति–स्पृश् (२.१) | her who was touching the earth |
| कृतवान् | कृतवत् (√कृ+क्तवतु, १.१) | he made |
| आसुर-पुष्प-दर्शनात् | आसुर–पुष्प–दर्शन (५.१) | until the sight of the divine flower |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भ | ग | व | न्प | र | वा | न | यं | ज | नः | |
| प्र | ति | कू | ला | च | रि | तं | क्ष | म | स्व | मे |
| इ | ति | चो | प | न | तां | क्षि | ति | स्पृ | शं | |
| कृ | त | वा | ना | सु | र | पु | ष्प | द | र्श | नात् |
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