अन्वयः
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रुदता भवता सा पुनः कुतः एव लभ्यते? अनुमृता अपि न लभ्यते । हि परलोक-जुषाम् देहिनाम् गतयः स्व-कर्मभिः भिन्न-पथाः (भवन्ति) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
रुदतेति॥ रुदता भवता सा कुत एव लभ्यते? न लभ्यत एव। अनुम्रियत इत्यनुमृत्। क्विप्। तेनानुमृतानुमृतवताऽपि भवता पुनर्न लभ्यते। कथं न लभ्यत इत्याह-परलोकजुषां लोकान्तरभाजां देहिनाम्। गम्यत इति गतयो गम्यस्थानानि स्वकर्मभिः पूर्वाचरितपुण्यपापैर्भिन्नपथाः पृथक्कृतमार्गा हि। परत्रापि स्वस्वधर्मानुरूपफलभोगाय भिन्नदेहगमनान्न मृतेनापि लभ्यत इत्यर्थः ॥
Summary
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How can she be regained by you weeping? She cannot be obtained even if you follow her in death. For the paths of embodied souls who have gone to the other world are different, determined by their own respective deeds.
सारांश
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विलाप करने से क्या लाभ? मृत्यु का वरण कर लेने पर भी वह पुनः प्राप्त नहीं हो सकतीं, क्योंकि परलोक जाने वाले जीवों की गतियाँ उनके अपने कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न होती हैं।
पदच्छेदः
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| रुदता | रुदत् (√रुद्+शतृ, ३.१) | by you weeping |
| कुतः | कुतस् | how |
| एव | एव | indeed |
| सा | तद् (१.१) | she |
| पुनः | पुनर् | again |
| भवता | भवत् (३.१) | by you |
| न | न | not |
| अनुमृता | अनुमृत (अनु√मृ+क्त, १.१) | followed in death |
| अपि | अपि | even |
| लभ्यते | लभ्यते (√लभ् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is obtained |
| परलोक-जुषाम् | परलोक–जुष् (६.३) | of those who have gone to the other world |
| स्व-कर्मभिः | स्व–कर्मन् (३.३) | by their own deeds |
| गतयः | गति (१.३) | the paths |
| भिन्न-पथाः | भिन्न–पथ (१.३) | having different paths |
| हि | हि | for |
| देहिनाम् | देहिन् (६.३) | of the embodied souls |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रु | द | ता | कु | त | ए | व | सा | पु | न | |
| र्भ | व | ता | ना | नु | मृ | ता | पि | ल | भ्य | ते |
| प | र | लो | क | जु | षां | स्व | क | र्म | भि | |
| र्ग | त | यो | भि | न्न | प | था | हि | दे | हि | नाम् |
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