तीर्थे तोयव्यतिकरभवे जह्नुकन्यासरय्वो-
र्देहत्यागादमरगणनालेख्यमासाद्य सद्यः ।
पूर्वाकाराधिकतररुचा संगतः कान्तयासौ
लीलागारेष्वरमत पुनर्नन्दनाभ्यन्तरेषु ॥
तीर्थे तोयव्यतिकरभवे जह्नुकन्यासरय्वो-
र्देहत्यागादमरगणनालेख्यमासाद्य सद्यः ।
पूर्वाकाराधिकतररुचा संगतः कान्तयासौ
लीलागारेष्वरमत पुनर्नन्दनाभ्यन्तरेषु ॥
र्देहत्यागादमरगणनालेख्यमासाद्य सद्यः ।
पूर्वाकाराधिकतररुचा संगतः कान्तयासौ
लीलागारेष्वरमत पुनर्नन्दनाभ्यन्तरेषु ॥
अन्वयः
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असौ जह्नु-कन्या-सरय्वोः तोय-व्यतिकर-भवे तीर्थे देह-त्यागात् सद्यः अमर-गणना-लेख्यम् आसाद्य, पूर्व-आकार-अधिकतर-रुचा कान्तया संगतः (सन्) पुनः नन्दन-अभ्यन्तरेषु लीला-आगारेषु अरमत ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तीर्थ इति॥ असावजो जह्नुकन्यासरय्वोस्तोयानां जलानां व्यतिकरेण संभेदेन भघवे तीर्थे गङ्गासरयूसंगमे देहत्यागात्सद्य एवामरगणनायां लेख्यं लेखनम्।
तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः (अष्टाध्यायी ३.४.७० ) इति भावार्थे ष्यत्प्रत्ययः। आसाद्य प्राप्य। पूर्वस्मादाकारादधिकतरा रुग्यस्यास्तया कान्तया रमण्या संगतः सन्। नन्दनस्येन्द्रोद्यानस्याभ्यन्तरेष्वन्तर्वर्तिषु लीलागारेषु क्रीडाभवनेषु पुनररमत। यथाकथंचित्तीर्थेऽस्मिन्देहत्यागं करोति यः। तस्यात्मघातदोषो न प्राप्नुयादीप्सितान्यपि॥ इति स्कान्दे। मन्दाक्रान्ताच्छन्दः। तल्लक्षणम्-मन्दाक्रान्ता जलधिषडगैम्भौ नतौ ताद्गुरू चेत् इति॥
Summary
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By abandoning his body at the holy confluence of the Ganga and Sarayu, he immediately attained the status of an immortal. Reunited with his beloved, who now possessed a beauty even greater than her former celestial form, he once again enjoyed himself in the pleasure-mansions within the Nandana garden.
सारांश
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गंगा और सरयू के संगम पर देह त्यागकर उन्होंने दिव्य स्वरूप प्राप्त किया और स्वर्ग में अपनी प्रियतमा के साथ पुनः नंदन वन के विहार-स्थलों में आनंदपूर्वक रहने लगे।
पदच्छेदः
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| तीर्थे | तीर्थ (७.१) | at the holy confluence |
| तोय-व्यतिकर-भवे | तोय–व्यतिकर–भव (७.१) | born from the mingling of waters |
| जह्नु-कन्या-सरय्वोः | जह्नुकन्या–सरयू (६.२) | of the Ganga and Sarayu |
| देह-त्यागात् | देह–त्याग (५.१) | from abandoning the body |
| अमर-गणना-लेख्यम् | अमर–गणना–लेख्य (२.१) | the state of being inscribed in the list of immortals |
| आसाद्य | आसाद्य (आ√सद्+ल्यप्) | having attained |
| सद्यः | सद्यस् | immediately |
| पूर्व-आकार-अधिकतर-रुचा | पूर्व–आकार–अधिकतर–रुच् (३.१) | with her whose beauty was even greater than her former form |
| संगतः | संगत (सम्√गम्+क्त, १.१) | reunited |
| कान्तया | कान्ता (३.१) | with his beloved |
| असौ | अदस् (१.१) | he |
| लीला-आगारेषु | लीला–आगार (७.३) | in the pleasure-mansions |
| अरमत | अरमत (√रम् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | he sported |
| पुनः | पुनर् | again |
| नन्दन-अभ्यन्तरेषु | नन्दन–अभ्यन्तर (७.३) | within the Nandana garden |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ती | र्थे | तो | य | व्य | ति | क | र | भ | वे | ज | ह्नु | क | न्या | स | र | य्वो |
| र्दे | ह | त्या | गा | द | म | र | ग | ण | ना | ले | ख्य | मा | सा | द्य | स | द्यः |
| पू | र्वा | का | रा | धि | क | त | र | रु | चा | सं | ग | तः | का | न्त | या | सौ |
| ली | ला | गा | रे | ष्व | र | म | त | पु | न | र्न | न्द | ना | भ्य | न्त | रे | षु |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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