अन्वयः
AI
अवभृथप्रयतः नियतेन्द्रियः सुरसमाजसमाक्रमणोचितः सः (दशरथः) केवलं नमुचेः अरये वनमुचे (इन्द्राय) उन्नतं शिरः नमयति स्म ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अवभृथेति॥ अवभृथेन प्रयतो नियतेन्द्रियः सुरसमाजसमाक्रमणोचितो देवसभाधिष्ठानार्हः स दशरथ उन्नतं शिरो वनमुचे जलवर्षिणे।
जलं नीरं वनं सत्त्वम् इति शाश्वतः। मनुचेररये केवलमिन्द्रायैव नमयति स्म। न कस्मैचिदन्यस्मै मानुषायेत्यर्थः ॥
Summary
AI
He (Dasharatha)—purified by the post-sacrificial bath, with senses controlled, and worthy of entering the assembly of gods—bowed his lofty head only to the enemy of Namuchi, the cloud-releaser (Indra).
सारांश
AI
यज्ञोपरांत स्नान से शुद्ध और इंद्रियों को वश में करने वाले राजा दशरथ ने केवल देवताओं के राजा इंद्र के सम्मुख ही अपना सिर झुकाया।
पदच्छेदः
AI
| अवभृथप्रयतः | अवभृथ–प्रयत (१.१) | purified by the Avabhritha bath |
| नियतेन्द्रियः | नियत–इन्द्रिय (१.१) | with senses controlled |
| सुरसमाजसमाक्रमणोचितः | सुर–समाज–समाक्रमण–उचित (१.१) | fit to enter the assembly of gods |
| नयति स्म | नमयति स्म (√नम् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | bowed |
| सः | तद् (१.१) | he |
| केवलम् | केवलम् | only |
| उन्नतम् | उन्नत (उत्√नम्+क्त, २.१) | lofty |
| वनमुचे | वनमुच् (४.१) | to the cloud-releaser (Indra) |
| नमुचेः | नमुचि (६.१) | of Namuchi |
| अरये | अरि (४.१) | to the enemy |
| शिरः | शिरस् (२.१) | head |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | व | भृ | थ | प्र | य | तो | नि | य | ते | न्द्रि | यः |
| सु | र | स | मा | ज | स | मा | क्र | म | णो | चि | तः |
| न | म | य | ति | स्म | स | के | व | ल | मु | न्न | तं |
| व | न | मु | चे | न | मु | चे | र | र | ये | शि | रः |
| न | भ | भ | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.