उपहितं शिशिरापगमश्रिया
मुकुलजालमशोभत किंशुके ।
प्रणयिनीव नखक्षतमण्डनं
प्रमदया मदयापितलज्जया ॥

अन्वयः AI शिशिरापगमश्रिया किंशुके उपहितं मुकुलजालं, मदयापितलज्जया प्रमदया (उपहितं) प्रणयिनि नखक्षतमण्डनम् इव, अशोभत।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) उपहितमिति॥ शिशिरापगमश्रिया वसन्तलक्ष्म्या किंशुके पलाशवृक्षे। पलाशः किंशुकः पर्णः इत्यमरः। उपहितं दत्तं मुकुलजालं कुड्यलसंहतिः। मदेन यापितलज्जयाऽपसारितत्रपया प्रमदया प्रणयिनी प्रियतम उपहितं नखक्षतमेव मण्डनं तदिव॥ अशोभत॥
Summary AI The cluster of buds placed upon the Kimshuka tree by the beauty of spring shone brightly, like the decorative nail marks inflicted upon a beloved by a passionate young woman whose shyness has been cast away by intoxication.
सारांश AI शिशिर के अंत की शोभा से युक्त पलाश की कलियाँ ऐसी दिखाई दीं, जैसे लज्जा त्याग चुकी किसी कामुक स्त्री के शरीर पर नख-क्षत के चिह्न हों।
पदच्छेदः AI
उपहितंउपहित (उप√धा+क्त, १.१) placed
शिशिरापगमश्रियाशिशिरअपगमश्री (३.१) by the beauty of the post-winter season
मुकुलजालम्मुकुलजाल (१.१) the cluster of buds
अशोभतअशोभत (√शुभ् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) shone
किंशुकेकिंशुक (७.१) on the Kimshuka tree
प्रणयिनिप्रणयिन् (७.१) on the beloved
इवइव like
नखक्षतमण्डनंनखक्षतमण्डन (१.१) the decoration of nail marks
प्रमदयाप्रमदा (३.१) by a young woman
मदयापितलज्जयामदयापित (√यापित+णिच्+क्त)लज्जा (३.१) whose shyness was dispelled by passion
छन्दः द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२
हि तं शि शि रा श्रि या
मु कु जा शो किं शु के
प्र यि नी क्ष ण्ड नं
प्र या या पि ज्ज या
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