अन्वयः
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पवनाहतैः सलयैः पाणिभिः इव किसलयैः (युक्ताः), श्रुतिसुखभ्रमरस्वनगीतयः, कुसुमकोमलदन्तरुचः उपवनान्तलताः बभुः।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
श्रुतीति॥ श्रुतिसुखाः कर्णमधुरा भ्रमरस्वना एव गीतयो यासां ताः। कुसुमान्येव कोमला दन्तरुचो दन्तकान्तयो यासां ताः। अनेन सस्मितत्वं विवक्षितम्। उपवनान्तलताः पवनेनाहतैः कम्पितैः किसलयैः सलयैः साभिनयैः।
लय शब्देन लयानुगतोऽभिनयो लक्ष्यते। उपवनान्ते पवनाहतैरिति सक्रियत्वाभिधानात्। पाणिभिरिव बभुः। अनेन तलानां नर्तकीसाम्यं गम्यते ॥
Summary
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The creepers in the garden's interior shone brightly. The pleasant humming of bees served as their song, the delicate flowers were their radiant teeth, and their wind-struck sprouts moved like rhythmic hands.
सारांश
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भौरों के मधुर गुंजन और खिले हुए पुष्पों वाली उपवन की लताएँ वायु से हिलते पल्लव रूपी हाथों से ताल देती हुई नाचती सी प्रतीत हुईं।
पदच्छेदः
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| श्रुतिसुखभ्रमरस्वनगीतयः | श्रुति–सुख–भ्रमर–स्वन–गीति (१.३) | whose songs were the pleasant humming of bees |
| कुसुमकोमलदन्तरुचः | कुसुम–कोमल–दन्त–रुच् (१.३) | whose teeth-like splendor was like delicate flowers |
| बभुः | बभुः (√भा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | shone |
| उपवनान्तलताः | उपवन–अन्त–लता (१.३) | the creepers in the garden |
| पवनाहतैः | पवन–आहत (आ√हन्+क्त, ३.३) | struck by the wind |
| किसलयैः | किसलय (३.३) | with sprouts |
| सलयैः | सलय (३.३) | rhythmic |
| इव | इव | like |
| पाणिभिः | पाणि (३.३) | with hands |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्रु | ति | सु | ख | भ्र | म | र | स्व | न | गी | त | यः |
| कु | सु | म | को | म | ल | द | न्त | रु | चो | ब | भुः |
| उ | प | व | ना | न्त | ल | ताः | प | व | ना | ह | तैः |
| कि | स | ल | यैः | स | ल | यै | रि | व | पा | णि | भिः |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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