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उपचितावयवा शुचिभिः कणै-
रलिकदम्बकयोगमुपेयुषी ।
सदृशकान्तिरलक्ष्यत मञ्जरी
तिलकजालकजालकमौक्तिकैः ॥

अन्वयः AI शुचिभिः कणैः उपचितावयवा, अलिकदम्बकयोगम् उपेयुषी तिलकजालकजालकमौक्तिकैः सदृशकान्तिः मञ्जरी अलक्ष्यत।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) उपचितेति॥ शुचिभिः शुभ्रैः कणै रजोभिरुपचितावयवा पुष्टावयवा। अलिकदम्बकयोगमुपेयुषी प्राप्ता। तिलकजा तिलकवृक्षोत्था मञ्जरी। अलकेषु जय्यालकमाभरणविशेषस्तस्मिन्मौक्तिकैः सदृशकान्तिः। अलक्ष्यत। भृङ्गसङ्गिनी शुभ्रा तिलकमञ्जरी नीलालकसक्ताजालमिवालक्ष्यतेति वाक्यार्थः ॥
Summary AI The flower cluster, its parts well-developed with white pollen and visited by swarms of bees, was perceived. Its splendor was similar to that of pearls on a net-like hair ornament made from the buds of the Tilaka tree.
सारांश AI सफेद पुष्प-कणों से युक्त और भोरों से घिरी तिलक की मंजरी मोतियों के जालीदार वस्त्र के समान सुंदर दिखाई दे रही थी।
पदच्छेदः AI
उपचितावयवाउपचित (उप√चि+क्त)–अवयवा (१.१) whose parts were developed
शुचिभिःशुचि (३.३) with white
कणैःकण (३.३) pollen grains
अलिकदम्बकयोगम्अलिकदम्बकयोग (२.१) union with a swarm of bees
उपेयुषीउपेयिवस् (उप√इ+क्वसु, १.१) having attained
सदृशकान्तिःसदृशकान्ति (१.१) having a similar splendor
अलक्ष्यतअलक्ष्यत (√लक्ष् भावकर्मणोः लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) was seen
मञ्जरीमञ्जरी (१.१) the flower cluster
तिलकजालकजालकमौक्तिकैःतिलकजालकजालकमौक्तिक (३.३) with the pearls of the net-like cluster of the Tilaka tree
छन्दः द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२
चि ता वा शु चि भिः णै
लि म्ब यो मु पे यु षी
दृ का न्ति क्ष्य ञ्ज री
ति जा जा मौ क्ति कैः
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