अन्वयः
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धनुर्भृतः मदनस्य ध्वजपटम्, ऋतुश्रियः छविकरम् मुखचूर्णम्, सपवन-उपवन-उत्थितम् कुसुमकेसररेणुम् अलिव्रजाः अन्वयुः।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
ध्वजेति॥ अलिव्रजाः षट्पदनिवहा धनुर्भृतो धानुष्कस्य मदनस्य कामस्य ध्वजपटं पताकाभूतम्। ऋतुश्रियो वसन्तलक्ष्म्याश्छविकरं शोभाकरं मुखचूर्णं मुखालंकारचूर्णभूतं सपवनोपवनोत्थितं सपवनं पवनेन सहितं यदुपवनं तस्मिन्नुत्थितम्। कुसुमानां केसरेषु किञ्जल्केषु यो रेणुस्तम्। अन्वयुरन्वगच्छन्। यातेर्लङ् ॥
Summary
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Swarms of bees followed the pollen from the filaments of flowers, which was raised by the wind from the gardens. This pollen served as the flag-cloth for the bow-wielding god of love, and as the beauty-enhancing face powder for the goddess of the spring season.
सारांश
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कामदेव की पताका और वसंत लक्ष्मी के मुख-चूर्ण के समान फूलों के पराग के पीछे-पीछे पवन के वेग से भोरों के समूह उड़ने लगे।
पदच्छेदः
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| ध्वजपटम् | ध्वजपट (२.१) | the flag-cloth |
| मदनस्य | मदन (६.१) | of Madana (god of love) |
| धनुर्भृतः | धनुस्–भृत् (६.१) | of the bow-wielder |
| छविकरम् | छवि–कर (२.१) | the beauty-maker |
| मुखचूर्णम् | मुख–चूर्ण (२.१) | the face-powder |
| ऋतुश्रियः | ऋतु–श्री (६.१) | of the beauty of the season |
| कुसुमकेसररेणुम् | कुसुम–केसर–रेणु (२.१) | the pollen from the filaments of flowers |
| अलिव्रजाः | अलि–व्रज (१.३) | swarms of bees |
| सपवनोपवनोत्थितम् | सपवन–उपवन–उत्थित (२.१) | risen from the garden with the wind |
| अन्वयुः | अन्वयुः (अनु√इ कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | followed |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ध्व | ज | प | टं | म | द | न | स्य | ध | नु | र्भृ | त |
| श्छ | वि | क | रं | मु | ख | चू | र्ण | मृ | तु | श्रि | यः |
| कु | सु | म | के | स | र | रे | णु | म | लि | व्र | जाः |
| स | प | व | नो | प | व | नो | त्थि | त | म | न्व | युः |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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