अन्वयः
AI
अथ विलासवतीसखः मधुमत्-मधुमन्मथ-संनिभः सः नरपतिः आर्तवम् उत्सवम् यथासुखम् समनुभूय मृगयारतिम् चकमे।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अथेति॥ अथानन्तरं मधुं मथ्नातीति मधुमद्विष्णुः। संपदादित्वात्क्विप्। पधुर्वसन्तः। मध्नातीति भावः। पचाद्यच्। मनसो मथो मन्मथः कामः। तेषां संनिभः सदृशो मधुमन्मधुमन्मथसंनिभः स नरपतिर्दशरथो विलासवतीसखः स्त्रीसहचरः सन्। ऋतुः प्राप्तोऽस्यार्तवः। तमुत्सवं वसन्तोत्सवं यथा-सुखं समनुभूय मृगयारतिं मृगयाविहारं चकम आचकाङ्क्ष ॥
Summary
AI
Then, after having comfortably enjoyed the seasonal festival in the company of playful women, that king, who resembled the god of love accompanied by Spring, desired the pleasure of hunting.
सारांश
AI
वसंत ऋतु के उत्सव का आनंद लेने के बाद, राजा दशरथ ने विलासी मित्रों के साथ शिकार खेलने की इच्छा प्रकट की।
पदच्छेदः
AI
| अथ | अथ | Then |
| यथासुखम् | यथासुखम् | comfortably |
| आर्तवम् | आर्तव (२.१) | the seasonal |
| उत्सवम् | उत्सव (२.१) | festival |
| समनुभूय | समनुभूय (सम्+अनु√भू+ल्यप्) | having fully experienced |
| विलासवतीसखः | विलासवती–सखि (१.१) | accompanied by playful women |
| नरपतिः | नर–पति (१.१) | the king |
| चकमे | चकमे (√कम् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | desired |
| मृगयारतिम् | मृगया–रति (२.१) | the delight in hunting |
| सः | तद् (१.१) | he |
| मधुमन्मधुमन्मथसंनिभः | मधुमत्–मधुमन्मथ–संनिभ (१.१) | resembling the god of love accompanied by Spring |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | य | था | सु | ख | मा | र्त | व | मु | त्स | वं |
| स | म | नु | भू | य | वि | ला | स | व | ती | स | खः |
| न | र | प | ति | श्च | क | मे | मृ | ग | या | र | तिं |
| स | म | धु | म | न्म | धु | म | न्म | थ | सं | नि | भः |
| न | भ | भ | र | ||||||||
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.