श्वगणिवागुरिकैः प्रथमास्थितं
व्यपगतानलदस्यु विवेश सः ।
स्थिगतुरंगमभूमि निपानव-
न्मृगवयोगवयोपचितं वनम् ॥
श्वगणिवागुरिकैः प्रथमास्थितं
व्यपगतानलदस्यु विवेश सः ।
स्थिगतुरंगमभूमि निपानव-
न्मृगवयोगवयोपचितं वनम् ॥
व्यपगतानलदस्यु विवेश सः ।
स्थिगतुरंगमभूमि निपानव-
न्मृगवयोगवयोपचितं वनम् ॥
अन्वयः
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सः श्वगणि-वागुरिकैः प्रथम-आस्थितम्, व्यपगत-अनल-दस्यु, स्थित-तुरङ्गम-भूमि, निपानवत्, मृग-वयः-गवय-उपचितम् वनम् विवेश।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
श्वगणीति॥ स दशरथः। शुनां गणः स एषामस्तीति श्वगणिनः श्वप्राहिणः। तैः। वागुरा मृगबन्धनरज्जुः।
वागुरा मृगबन्धनी इत्यमरः (अमरकोशः २.१०.२६ ) । तया चरन्तीति वागुरिका जालिकाः। चरति (अष्टाध्यायी ४.४.८ ) इति ठक्प्रत्ययः। द्वौ वागुरिकजालिकौ इत्यमरः (अमरकोशः २.१०.१४ ) । तैशअच प्रथममास्थइतमधिष्ठितम्। व्यपगता अनला दावाग्नयो दस्यवस्तस्कराश्च। यस्मात्तथोक्तम्। दस्युतस्करमोषकाः इत्यमरः (अमरकोशः २.१०.२४ ) । कारयेद्वनविशोधनमादौ मातुरन्तिकमपि प्रविविक्षुः। आप्तशस्त्र्यनुगतः प्रविशेद्वा संकटे च गहने च न तिष्ठेत्॥ इति कामन्दकः। स्थिरा दृढा पङ्कादिरहिता तुरंगमयोग्या भूमिर्यस्य तत्। निपानवदाहावयुक्तम्। आहावस्तु निपानं स्याद्गुपकूपजलाशये इत्यमरः (अमरकोशः २.१०.२६ ) । मृगैर्हरिणादिभिर्वयोभिः पक्षिभिर्गवयैर्गोसदृशैररण्यपशुविशेषैश्चोपचितं समृद्धं वनं विवेश प्रविष्टवान् ॥
Summary
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He entered the forest, which had been previously secured by huntsmen with dogs and nets. It was cleared of fires and robbers, had firm ground for horses, possessed watering places, and was teeming with deer, birds, and gayals.
सारांश
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शिकारी कुत्तों और जाल बिछाने वालों के साथ राजा ने उस सुरक्षित, जलाशयों और पशुओं से भरे सघन वन में प्रवेश किया।
पदच्छेदः
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| श्वगणिवागुरिकैः | श्वगणिन्–वागुरिक (३.३) | by huntsmen with dogs and nets |
| प्रथमास्थितम् | प्रथम–आस्थित (२.१) | previously occupied |
| व्यपगतानलदस्यु | व्यपगत–अनल–दस्यु (२.१) | from which fires and robbers were removed |
| विवेश | विवेश (√विश् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | entered |
| सः | तद् (१.१) | he |
| स्थिततुरङ्गमभूमि | स्थित–तुरङ्गम–भूमि (२.१) | where horses could stand firm |
| निपानवत् | निपानवत् (२.१) | having drinking places |
| मृगवयोगवयोपचितम् | मृग–वयस्–गवय–उपचित (२.१) | abounding in deer, birds, and gayals |
| वनम् | वन (२.१) | the forest |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्व | ग | णि | वा | गु | रि | कैः | प्र | थ | मा | स्थि | तं |
| व्य | प | ग | ता | न | ल | द | स्यु | वि | वे | श | सः |
| स्थि | ग | तु | रं | ग | म | भू | मि | नि | पा | न | व |
| न्मृ | ग | व | यो | ग | व | यो | प | चि | तं | व | नम् |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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