तत्प्रार्थितं जवनवाजिगतेन राज्ञा
तूर्णीमुखोद्धृतशरेण विशीर्णपङ्क्ति ।
श्यामीचकार वनमाकुलदृष्टिपातै
र्वातेरितोत्पलदलप्रकरैरिवार्द्रैः ॥
तत्प्रार्थितं जवनवाजिगतेन राज्ञा
तूर्णीमुखोद्धृतशरेण विशीर्णपङ्क्ति ।
श्यामीचकार वनमाकुलदृष्टिपातै
र्वातेरितोत्पलदलप्रकरैरिवार्द्रैः ॥
तूर्णीमुखोद्धृतशरेण विशीर्णपङ्क्ति ।
श्यामीचकार वनमाकुलदृष्टिपातै
र्वातेरितोत्पलदलप्रकरैरिवार्द्रैः ॥
अन्वयः
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जवन-वाजि-गतेन तूर्णी-मुख-उद्धृत-शरेण राज्ञा प्रार्थितम्, विशीर्ण-पङ्क्ति तत् (यूथम्) आर्द्रैः आकुल-दृष्टि-पातैः, वात-ईरित-उत्पल-दल-प्रकरैः इव, वनम् श्यामीचकार।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तदिति॥ जवनो जवशीलः।
जुचंक्रम्य- (अष्टाध्यायी ३.२.१५० ) इत्यादिना युच्प्रत्तययः। तरस्वी त्वरितो वेगी प्रजवी जवनो जवः इत्यमरः (अमरकोशः २.८.७३ ) । तं वाजिनमश्वं गतेनारूडेन। तूणीषुधिः। बह्वादिभ्यश्च (अष्टाध्यायी ४.१.५४ ) इति स्त्रियां ङीष्। तस्या मुखाद्विवरादुद्धृतशरेण राज्ञा प्रार्थितमभियाचितम्। याच्ञायामभियाने च प्रार्थना कथ्यते बुधैःइति केशवः। अत एव विशीर्णा पङ्क्तिः संघीभावो यस्य तत्। मृगयूथं कर्तृ आद्रैर्भयादश्रुसिक्तैराकुला भयचकिता ये दृष्टिपातास्तैः। वातेरितोत्पलदलप्रकरैः पवनकम्पितेन्दीवरदलवृन्दैरिव। वनं श्यामीचकार ॥
Summary
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Pursued by the king who was mounted on a swift horse and had drawn an arrow from his quiver, the herd, its formation now broken, darkened the forest with its tearful, bewildered glances, which were like heaps of wet blue lotus petals scattered by the wind.
सारांश
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तीव्र घोड़े पर सवार राजा के बाणों से भयभीत हिरणों की चंचल आंखें ऐसी लग रही थीं जैसे हवा से बिखरे हुए नीले कमल हों।
पदच्छेदः
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| तत् | तद् (१.१) | That (herd) |
| प्रार्थितम् | प्रार्थित (प्र√अर्थ्+क्त, १.१) | pursued |
| जवनवाजिगतेन | जवन–वाजिन्–गत (३.१) | by him who was mounted on a swift horse |
| राज्ञा | राजन् (३.१) | by the king |
| तूर्णीमुखोद्धृतशरेण | तूर्णी–मुख–उद्धृत–शर (३.१) | by him who had drawn an arrow from the mouth of his quiver |
| विशीर्णपङ्क्ति | विशीर्ण–पङ्क्ति (१.१) | with its formation broken |
| श्यामीचकार | श्यामीचकार (श्यामी√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made dark |
| वनम् | वन (२.१) | the forest |
| आकुलदृष्टिपातैः | आकुल–दृष्टि–पात (३.३) | with bewildered glances |
| वातेरितोत्पलदलप्रकरैः | वात–ईरित–उत्पल–दल–प्रकर (३.३) | by heaps of blue lotus petals scattered by the wind |
| इव | इव | like |
| आर्द्रैः | आर्द्र (३.३) | wet/tearful |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त्प्रा | र्थि | तं | ज | व | न | वा | जि | ग | ते | न | रा | ज्ञा |
| तू | र्णी | मु | खो | द्धृ | त | श | रे | ण | वि | शी | र्ण | प | ङ्क्ति |
| श्या | मी | च | का | र | व | न | मा | कु | ल | दृ | ष्टि | पा | तै |
| र्वा | ते | रि | तो | त्प | ल | द | ल | प्र | क | रै | रि | वा | र्द्रैः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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