व्याघ्रनभीरभिमुखोत्पतितान्गुहाभ्यः
फुल्लासनाग्रविटपानिव वायुरुग्णान् ।
शिक्षाविशेषलघुहस्ततया निमेषा-
त्तूणीचकार शरपूरितवक्त्ररन्ध्रान् ॥
व्याघ्रनभीरभिमुखोत्पतितान्गुहाभ्यः
फुल्लासनाग्रविटपानिव वायुरुग्णान् ।
शिक्षाविशेषलघुहस्ततया निमेषा-
त्तूणीचकार शरपूरितवक्त्ररन्ध्रान् ॥
फुल्लासनाग्रविटपानिव वायुरुग्णान् ।
शिक्षाविशेषलघुहस्ततया निमेषा-
त्तूणीचकार शरपूरितवक्त्ररन्ध्रान् ॥
अन्वयः
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अभीः (सः) गुहाभ्यः अभिमुख-उत्पतितान्, वायु-रुग्णान् फुल्ल-असन-अग्र-विटपान् इव (स्थितान्) व्याघ्रान्, शिक्षा-विशेष-लघु-हस्ततया निमेषात् शर-पूरित-वक्त्र-रन्ध्रान् तूणीचकार।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
व्याघ्रानिति॥ अभीर्निर्भीकः स धन्वी गुहाभ्योऽभिमुखमुत्पतितान्। वायुना रुग्णान्भग्नान्। फुल्ला विकसिताः।
अनुपलर्गात्फुल्लक्षीवकृशोल्लाघाः (अष्टाध्यायी ३.२.५५ ) इति निष्ठातकारस्य लत्वनिपातः। येऽसनस्य सर्जवक्षस्य। सर्जकासनबन्धूकपुष्पप्रियकजीवकाः इत्यमरः (अमरकोशः २.४.४४ ) । अग्रविटपास्तानिव स्थितान्। इषुधिभूतानित्यर्थः। व्याघ्राणां चित्ररूपत्वादुपमाने फुल्लविशेषणम्। शरैः पूरितानि वक्त्ररन्ध्राणि येषां तान्व्याघ्रान्। शिक्षाविशेषेणाभ्यासातिशयेन लघुहस्ततया क्षिप्रहस्ततया निमेषात्तूणीचकार। तूणं शरैः पूरितवानित्यर्थथः॥
Summary
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The fearless king, with a swiftness of hand born from special training, in the twinkling of an eye, turned the tigers leaping towards him from their caves into quivers by filling their mouths with arrows. They resembled the top branches of blooming Asana trees broken by the wind.
सारांश
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गुफाओं से सामने की ओर झपटते हुए बाघों के मुखों को राजा ने अपनी फुर्ती और अचूक निशानेबाजी से बाणों से भर दिया, जिससे वे क्षण भर में तरकस के समान दिखने लगे।
पदच्छेदः
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| व्याघ्रान् | व्याघ्र (२.३) | tigers |
| अभीः | अभी (१.१) | fearless |
| अभिमुखोत्पतितान् | अभिमुख–उत्पतित (२.३) | who were leaping towards him |
| गुहाभ्यः | गुहा (५.३) | from caves |
| फुल्लासनाग्रविटपान् | फुल्ल–असन–अग्रविटप (२.३) | the top branches of blooming Asana trees |
| इव | इव | like |
| वायुरुग्णान् | वायु–रुग्ण (२.३) | broken by the wind |
| शिक्षाविशेषलघुहस्ततया | शिक्षा–विशेष–लघुहस्तता (३.१) | due to the lightness of hand from special training |
| निमेषात् | निमेष (५.१) | in a moment |
| तूणीचकार | तूणीचकार (तूणी√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made into quivers |
| शरपूरितवक्त्ररन्ध्रान् | शर–पूरित–वक्त्ररन्ध्र (२.३) | whose mouth-cavities were filled with arrows |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व्या | घ्र | न | भी | र | भि | मु | खो | त्प | ति | ता | न्गु | हा | भ्यः |
| फु | ल्ला | स | ना | ग्र | वि | ट | पा | नि | व | वा | यु | रु | ग्णान् |
| शि | क्षा | वि | शे | ष | ल | घु | ह | स्त | त | या | नि | मे | षा |
| त्तू | णी | च | का | र | श | र | पू | रि | त | व | क्त्र | र | न्ध्रान् |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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