स ललितकुसुमप्रवालशय्यां
ज्वलितमहौषधिदीपिकासनाथम् ।
नरपतिरतिवाहयांबभूव
क्वचिदसमेतपरिच्छदस्त्रियामाम् ॥

अन्वयः AI क्वचित् असमेत-परिच्छदः सः नरपतिः ललित-कुसुम-प्रवाल-शय्यां ज्वलित-महा-ओषधि-दीपिका-सनाथाम् त्रियामां अतिवाहयांबभूव।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) स इति॥ स नरपतिः ललितानि कुसुमानि प्रवालानि पल्लवानि शय्या यस्यां ताम्। ज्वलिताभिर्महौषधिभिरेव दीपिकाभिः सनाथाम्। तत्प्रधानामित्यर्थः। त्रियामां रात्रिं क्वचिदसमेतपरिच्छदः। परिहृतपरिजनः सन्नित्यर्थः। अतिवाहयांबभूव गमयामास। पुष्पिताग्रावृत्तम् ॥
Summary AI Somewhere in the forest, the king, without his usual retinue, spent the night on a bed of charming flowers and new sprouts, which was illuminated by the natural lamps of glowing medicinal herbs.
सारांश AI राजा ने जंगल में फूलों और कोमल पत्तों की शय्या पर रात बिताई, जहाँ जलती हुई दिव्य औषधियाँ दीपकों का कार्य कर रही थीं और उनके पास कोई परिजन नहीं था।
पदच्छेदः AI
सःतत् (१.१) he
ललितकुसुमप्रवालशय्याम्ललितकुसुमप्रवालशय्या (२.१) on a bed of charming flowers and sprouts
ज्वलितमहौषधिदीपिकासनाथाम्ज्वलित (√ज्वलित+क्त)महाओषधिदीपिकासनाथ (२.१) accompanied by the lamps of glowing medicinal herbs
नरपतिःनरपति (१.१) the king
अतिवाहयांबभूवअतिवाहयांबभूव (अति√वह् +णिच् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) spent
क्वचित्क्वचित् somewhere
असमेतपरिच्छदःअसमेतपरिच्छद (१.१) without his usual retinue
त्रियामाम्त्रियामा (२.१) the night
छन्दः पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३
लि कु सु प्र वा य्यां
ज्व लि हौ धि दी पि का ना थम्
ति ति वा यां भू
क्व चि मे रि च्छ स्त्रि या माम्
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