शापोऽप्यदृष्टतनयाननपद्मशोभे
सानुग्रहो भगवता मयि पातितोऽयम् ।
कृष्यां दहन्नपि खलु क्षितिमिन्धनेद्धो
बीजप्ररोहजननीं ज्वलनः करोति ॥
शापोऽप्यदृष्टतनयाननपद्मशोभे
सानुग्रहो भगवता मयि पातितोऽयम् ।
कृष्यां दहन्नपि खलु क्षितिमिन्धनेद्धो
बीजप्ररोहजननीं ज्वलनः करोति ॥
सानुग्रहो भगवता मयि पातितोऽयम् ।
कृष्यां दहन्नपि खलु क्षितिमिन्धनेद्धो
बीजप्ररोहजननीं ज्वलनः करोति ॥
अन्वयः
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भगवता अदृष्ट-तनय-आनन-पद्म-शोभे मयि अयम् शापः अपि स-अनुग्रहः पातितः। खलु इन्धन-इद्धः ज्वलनः कृष्यां क्षितिं दहन् अपि बीज-प्ररोह-जननीं करोति।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
शाप इति॥ अदृष्टा तनयाननपद्मशोभा येन तस्मिन्नपुत्रके मयि भगवता पातितः वज्रपायत्वात्
पुत्रशोकान्म्रियस्वइत्येवंरूपः शापोऽपि सानुग्रहः वृद्धकुमारीवरन्यायेनेष्टावाप्तेरन्तरीयकत्वात्सोपकार एव। निग्राहकस्याप्यनुग्राहकत्वमर्थान्तरन्यासेनाह-कृष्यामिति। इन्धनैः काष्ठैरिद्धः प्रज्वलितो ज्वलनोऽग्निः कृष्यां कर्षणार्हम्। ऋदुपधाञ्चाक्लृपि चृतेः (अष्टाध्यायी ३.१.११० ) इति क्यप्। क्षितिं दहन्नपि बीजप्ररोहाणां बीजाङ्कुराणां जननीमुत्पादनक्षमां करोति ॥
Summary
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"Revered sir, this curse you have cast on me—who has not yet seen the beauty of a son's lotus-face—is actually a favor. Indeed, a fire fueled by wood, while burning the ground for cultivation, also makes it fertile for seeds to sprout."
सारांश
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राजा ने कहा कि पुत्र का मुख न देखने वाले मेरे लिए यह शाप वरदान जैसा है; जैसे अग्नि खेत को जलाती तो है, किंतु उसे बीज उगाने योग्य भी बना देती है।
पदच्छेदः
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| शापः | शाप (१.१) | curse |
| अपि | अपि | even |
| अदृष्टतनयाननपद्मशोभे | अदृष्ट (√अदृष्ट+क्त)–तनय–आनन–पद्म–शोभा (७.१) | on me, for whom the beauty of a son's lotus-face is unseen |
| सानुग्रहः | स–अनुग्रह (१.१) | a favor |
| भगवता | भगवत् (३.१) | by you, revered one |
| मयि | अस्मद् (७.१) | on me |
| पातितः | पातित (√पत्+णिच्+क्त, १.१) | has been cast |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| कृष्याम् | कृषि (७.१) | in agriculture |
| दहन् | दहत् (√दह्+शतृ, १.१) | burning |
| अपि | अपि | even while |
| खलु | खलु | indeed |
| क्षितिम् | क्षिति (२.१) | the earth |
| इन्धनेद्धः | इन्धन–इद्ध (√इद्ध+क्त, १.१) | kindled by fuel |
| बीजप्ररोहजननीम् | बीज–प्ररोह–जननी (२.१) | producer of sprouting seeds |
| ज्वलनः | ज्वलन (१.१) | fire |
| करोति | करोति (√कृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | makes |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शा | पो | ऽप्य | दृ | ष्ट | त | न | या | न | न | प | द्म | शो | भे |
| सा | नु | ग्र | हो | भ | ग | व | ता | म | यि | पा | ति | तो | ऽयम् |
| कृ | ष्यां | द | ह | न्न | पि | ख | लु | क्षि | ति | मि | न्ध | ने | द्धो |
| बी | ज | प्र | रो | ह | ज | न | नीं | ज्व | ल | नः | क | रो | ति |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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