निमन्त्रयस्य नृपतीन्पृथिव्यां ये च धार्मिकाः ।
ब्राह्मणान्क्षत्रियान्वैश्याञ्शूद्रांश्चैव सहस्रशः ॥
निमन्त्रयस्य नृपतीन्पृथिव्यां ये च धार्मिकाः ।
ब्राह्मणान्क्षत्रियान्वैश्याञ्शूद्रांश्चैव सहस्रशः ॥
पदच्छेदः
| निमन्त्रयस्व | निमन्त्रयस्व (√नि-मन्त्रय् लोट् म.पु. ) |
| नृपतीन् | नृपति (२.३) |
| पृथिव्यां | पृथिवी (७.१) |
| ये | यद् (१.३) |
| च | च (अव्ययः) |
| धार्मिकाः | धार्मिक (१.३) |
| ब्राह्मणान् | ब्राह्मण (२.३) |
| क्षत्रियान् | क्षत्रिय (२.३) |
| वैश्याञ् | वैश्य (२.३) |
| शूद्रांश् | शूद्र (२.३) |
| चैव | च (अव्ययः)–एव (अव्ययः) |
| सहस्रशः | सहस्रशस् (अव्ययः) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | म | न्त्र | य | स्य | नृ | प | ती |
| न्पृ | थि | व्यां | ये | च | धा | र्मि | काः |
| ब्रा | ह्म | णा | न्क्ष | त्रि | या | न्वै | श्या |
| ञ्शू | द्रां | श्चै | व | स | ह | स्र | शः |