तदग्निना पुनर्व्याप्तं संजातः श्वेतपर्वतः ।
दिव्यं शरवणं चैव पावकादित्यसंनिभम् ।
यत्र जातो महातेजाः कार्तिकेयोऽग्निसंभवः ॥
तदग्निना पुनर्व्याप्तं संजातः श्वेतपर्वतः ।
दिव्यं शरवणं चैव पावकादित्यसंनिभम् ।
यत्र जातो महातेजाः कार्तिकेयोऽग्निसंभवः ॥
अन्वयः
अग्निना by fire, व्याप्तम् pervaded, तत् that energy, पुन: again, श्वेतपर्वत: celestial white mountain, सञ्जात: became, पावकादित्यसन्निभम् resplendent as fire or Sun, दिव्यम् celestial, शरवणं चैव became forest of reeds, यत्र in which, महातेजा: glorious, अग्निसम्भव: born from fire, कार्तिकेय: son of Krittika, Kartikeya, जात: was born.M N Dutt
When the Wind had entered into it, it was developed into a white hill, and a forest of glossy reeds, resembling fire or the Sun.Summary
That energy pervaded by fire was transformed into the White Mountain. It turned the forest of reeds (Saravana) (blazing) like the fire or the Sun. From that fire was born the glorious Kartikeya.पदच्छेदः
| तद् | तद् (१.१) |
| अग्निना | अग्नि (३.१) |
| पुनर् | पुनर् (अव्ययः) |
| व्याप्तं | व्याप्त (√वि-आप् + क्त, १.१) |
| संजातः | संजात (√सम्-जन् + क्त, १.१) |
| श्वेतपर्वतः | श्वेतपर्वत (१.१) |
| दिव्यं | दिव्य (१.१) |
| शरवणं | शरवण (१.१) |
| चैव | च (अव्ययः)–एव (अव्ययः) |
| पावकादित्यसंनिभम् | पावक–आदित्य–संनिभ (१.१) |
| यत्र | यत्र (अव्ययः) |
| जातो | जात (√जन् + क्त, १.१) |
| महातेजाः | महत्–तेजस् (१.१) |
| कार्त्तिकेयो | कार्त्तिकेय (१.१) |
| ऽग्निसम्भवः | अग्नि–सम्भव (१.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | द | ग्नि | ना | पु | न | र्व्या | प्तं | सं | जा | तः | श्वे |
| त | प | र्व | तः | दि | व्यं | श | र | व | णं | चै | व |
| पा | व | का | दि | त्य | सं | नि | भम् | य | त्र | जा | तो |
| म | हा | ते | जाः | का | र्ति | के | यो | ऽग्नि | सं | भ | वः |