अन्वयः
काकुत्स्थे when Rama, एवम् in this manner, ब्रुवति had spoken, अथ thereafter, धृतिमान् one possessed of fortitude, सुव्रत: a man of excellent vows, शुचि: pure, विश्वामित्र: महामुनि: Viswamitra maharshi, संहारम् withdrawl, व्याजहार told.
Summary
To these words spoken by Rama, maharshi Viswamitra who was patient practitioner of vows and pure taught the withdrawl mantra.
पदच्छेदः
| तथा | तथा (अव्ययः) |
| ब्रुवति | ब्रुवत् (√ब्रू + शतृ, ७.१) |
| काकुत्स्थे | काकुत्स्थ (७.१) |
| विश्वामित्रस् | विश्वामित्र (१.१) |
| तपोधनः | तपोधन (१.१) |
| निखिलेन | निखिल (३.१) |
| कथां | कथा (२.१) |
| सर्वाम् | सर्व (२.१) |
| ऋषिमध्ये | ऋषि–मध्य (७.१) |
| न्यवेदयत् | न्यवेदयत् (√नि-वेदय् लङ् प्र.पु. एक.) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| त | था | ब्रु | व | ति | का | कु | त्स्थे |
| वि | श्वा | मि | त्र | स्त | पो | ध | नः |
| नि | खि | ले | न | क | थां | स | र्वा |
| मृ | षि | म | ध्ये | न्य | वे | द | यत् |