अभिगम्य सुराः सर्वे प्रणिपत्येदमब्रुवन् ।
देवदेव महादेव लोकस्यास्य हिते रत ।
सुराणां प्रणिपातेन प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥
अभिगम्य सुराः सर्वे प्रणिपत्येदमब्रुवन् ।
देवदेव महादेव लोकस्यास्य हिते रत ।
सुराणां प्रणिपातेन प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥
अन्वयः
सुरा: devatas, सर्वे all, अभिगम्य approaching Siva, प्रणिपत्य paying obeisance, इदम् these words, अब्रुवन् spoke, देवदेव O God of devatas, अस्य लोकस्य for this world, हिते रत engaged in doing welfare of all, महादेव O Mahadeva, सुराणाम् for celestials, प्रणिपातेन with salutations, प्रसादम् mercy, कर्तुम् अर्हसि capable of doing it.M N Dutt
O god of gods! O mighty deity! ever engaged in the welfare of all, it behove you to be propitious at the humble salutations of the celestials.Summary
All devatas approached Siva and paying their obeisance said, "O God of the gods engaged in the welfare of all O Mahadeva accept our salutations Be king which you can be (if you will)".पदच्छेदः
| अभिगम्य | अभिगम्य (√अभि-गम् + ल्यप्) |
| सुराः | सुर (१.३) |
| सर्वे | सर्व (१.३) |
| प्रणिपत्येदम् | प्रणिपत्य (√प्रणि-पत् + ल्यप्)–इदम् (२.१) |
| अब्रुवन् | अब्रुवन् (√ब्रू लङ् प्र.पु. बहु.) |
| देवदेव | देवदेव (८.१) |
| महादेव | महादेव (८.१) |
| लोकस्यास्य | लोक (६.१)–इदम् (६.१) |
| हिते | हित (७.१) |
| रत | रत (√रम् + क्त, ८.१) |
| सुराणां | सुर (६.३) |
| प्रणिपातेन | प्रणिपात (३.१) |
| प्रसादं | प्रसाद (२.१) |
| कर्तुम् | कर्तुम् (√कृ + तुमुन्) |
| अर्हसि | अर्हसि (√अर्ह् लट् म.पु. ) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भि | ग | म्य | सु | राः | स | र्वे | प्र | णि | प | त्ये |
| द | म | ब्रु | वन् | दे | व | दे | व | म | हा | दे | व |
| लो | क | स्या | स्य | हि | ते | र | त | सु | रा | णां | प्र |
| णि | पा | ते | न | प्र | सा | दं | क | र्तु | म | र्ह | सि |