अन्वयः
तदा then, शिंशुमारोरगगणै: by multitudes of sea animals and serpents, चञ्चलै: which had fickle movements, मीनैरपि च with the fish also, आकाशम् the sky, विद्युद्भिः with flashes of lightening, विक्षिप्तमिव as if scattered, अभवत् became.
Summary
The sky strewn with lightnings appeared as if it was inhabited by seaanimals, serpents and fishes fickle.
पदच्छेदः
| शिंशुमारोरगगणैर् | शिंशुमार–उरग–गण (३.३) |
| मीनैर् | मीन (३.३) |
| अपि | अपि (अव्ययः) |
| च | च (अव्ययः) |
| चञ्चलैः | चञ्चल (३.३) |
| विद्युद्भिर् | विद्युत् (३.३) |
| इव | इव (अव्ययः) |
| विक्षिप्तैर् | विक्षिप्त (√वि-क्षिप् + क्त, ३.३) |
| आकाशम् | आकाश (१.१) |
| अभवत् | अभवत् (√भू लङ् प्र.पु. एक.) |
| तदा | तदा (अव्ययः) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| शिं | शु | मा | रो | र | ग | ग | णै |
| र्मी | नै | र | पि | च | च | ञ्च | लैः |
| वि | द्यु | द्भि | रि | व | वि | क्षि | प्तै |
| रा | का | श | म | भ | व | त्त | दा |