१.४७.३

पद्मपत्रविशालाक्षौ खड्गतूणीधनुर्धरौ ।
अश्विनाविव रूपेण समुपस्थितयौवनौ ॥

पदच्छेदः

पद्मपत्त्रविशालाक्षौपद्म–पत्त्र–विशाल–अक्ष (१.२)–पद्म–पत्त्र–विशाल–अक्ष (१.२)
खड्गतूणीधनुर्धरौखड्ग–तूणी–धनुस्–धर (१.२)–खड्ग–तूणी–धनुस्–धर (१.२)
अश्विनाव्अश्विन् (१.२)–अश्विन् (१.२)
इवइव (अव्ययः)–इव (अव्ययः)
रूपेणरूप (३.१)–रूप (३.१)
समुपस्थितयौवनौसमुपस्थित (√समुप-स्था + क्त)–यौवन (१.२)–समुपस्थित (√समुप-स्था + क्त)–यौवन (१.२)

छन्दः

अनुष्टुप् [८]

छन्दोविश्लेषणम्

द्मत्रवि शा ला क्षौ
ड्ग तू णी नुर्ध रौ
श्वि नावि रू पे
मुस्थि यौ नौ