ऋषिपुत्रास्तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं घोराभिसंहितम् ।
शेपुः परमसंक्रुद्धाश्चण्डालत्वं गमिष्यसि ।
एवमुक्त्वा महात्मानो विविशुस्ते स्वमाश्रमम् ॥
ऋषिपुत्रास्तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं घोराभिसंहितम् ।
शेपुः परमसंक्रुद्धाश्चण्डालत्वं गमिष्यसि ।
एवमुक्त्वा महात्मानो विविशुस्ते स्वमाश्रमम् ॥
अन्वयः
ऋषिपुत्रास्तु saint's sons, घोराभिसंहितम् with fierce intent, तत् that, वाक्यम् word, श्रुत्वा having listened, परमसङ्कृद्धा: highly furious, चण्डालत्वम् chandalahood, गमिष्यसि will obtain, शेपु: cursed.M N Dutt
The saint's sons, on their part, hearing that speech couching a fierce intent, cursed him in exceeding wrath, saying, 'You shall come by Candāla-hood.' Having said this, those highsouled ones entered each into his dwelling.'Summary
Having seen his fierce intent, the saint's sons were infuriated. They cursed him saying, "Be a Chandala"पदच्छेदः
| ऋषिपुत्रास् | ऋषि–पुत्र (१.३) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| तच् | तद् (२.१) |
| छ्रुत्वा | श्रुत्वा (√श्रु + क्त्वा) |
| वाक्यं | वाक्य (२.१) |
| घोराभिसंहितम् | घोर–अभिसंहित (√अभिसम्-धा + क्त, २.१) |
| शेपुः | शेपुः (√शप् लिट् प्र.पु. बहु.) |
| परमसंक्रुद्धाश् | परम–संक्रुद्ध (√सम्-क्रुध् + क्त, १.३) |
| चण्डालत्वं | चण्डाल–त्व (२.१) |
| गमिष्यसि | गमिष्यसि (√गम् लृट् म.पु. ) |
| एवम् | एवम् (अव्ययः) |
| उक्त्वा | उक्त्वा (√वच् + क्त्वा) |
| महात्मानो | महात्मन् (१.३) |
| विविशुस् | विविशुः (√विश् लिट् प्र.पु. बहु.) |
| ते | तद् (१.३) |
| स्वम् | स्व (२.१) |
| आश्रमम् | आश्रम (२.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ऋ | षि | पु | त्रा | स्तु | त | च्छ्रु | त्वा | वा | क्यं | घो | रा |
| भि | सं | हि | तम् | शे | पुः | प | र | म | सं | क्रु | द्धा |
| श्च | ण्डा | ल | त्वं | ग | मि | ष्य | सि | ए | व | मु | क्त्वा |
| म | हा | त्मा | नो | वि | वि | शु | स्ते | स्व | मा | श्र | मम् |