अन्वयः
नराधिप O King, य: such that, त्वम् you, शरण्यम् fit to take refuge in, कौशिकम् Visvamitra, आगम्य having reached, शरणागतः have taken refuge, तव for you, स्वर्गम् heaven, हस्तप्राप्तम् already in your hand, मन्ये I consider.
Summary
O King since you have taken refuge in Viswamitra who is the protector of those who resort to him, I think heaven is already within your reach".
पदच्छेदः
| हस्तप्राप्तम् | हस्त–प्राप्त (√प्र-आप् + क्त, २.१) |
| अहं | मद् (१.१) |
| मन्ये | मन्ये (√मन् लट् उ.पु. ) |
| स्वर्गं | स्वर्ग (२.१) |
| तव | त्वद् (६.१) |
| नरेश्वर | नरेश्वर (८.१) |
| यस् | यद् (१.१) |
| त्वं | त्वद् (१.१) |
| कौशिकम् | कौशिक (२.१) |
| आगम्य | आगम्य (√आ-गम् + ल्यप्) |
| शरण्यं | शरण्य (२.१) |
| शरणं | शरण (२.१) |
| गतः | गत (√गम् + क्त, १.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| ह | स्त | प्रा | प्त | म | हं | म | न्ये |
| स्व | र्गं | त | व | न | रे | श्व | र |
| य | स्त्वं | कौ | शि | क | मा | ग | म्य |
| श | र | ण्यं | श | र | णं | ग | तः |